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तीन सेक्स वर्कर रिहा, वेश्यावृत्ति अपराध नहीं – बम्बई हाईकोर्ट !

मजिस्ट्रेट 3 सप्ताह से अधिक बालिग युवतियों को रिमांड होम कस्टडी में नहीं रख सकते।

तीन सेक्स वर्कर रिहा, वेश्यावृत्ति अपराध नहीं – बम्बई हाईकोर्ट !
मजिस्ट्रेट 3 सप्ताह से अधिक बालिग युवतियों को रिमांड होम कस्टडी में नहीं रख सकते।

तीन युवतियों को रिहाई देते हुए बम्बई हाईकोर्ट ने इम्मोरल ट्रेफिक प्रिवेंसन एक्ट 1956 की व्याख्या करते हुए कहा है कि युवतियों को अपनी इच्छा से कोई भी काम करने का अधिकार है और उन्हें उनकी इच्छा के विरूद्ध सुधार गृह में रोककर नहीं रखा जा सकता है।

जस्टिस पृथ्वीराज चव्हाण ने आदेश पारित किया है कि पिछले साल सितंबर में तीन युवतियों को गेस्ट हाउस में वेश्यावृत्ति पीडि़त के आरोप में कस्टडी में लेकर सुधार गृह में रखा गया था। तीनों युवतियों की कस्टडी उनके परिजनों को नहीं दी गई थी। इस मामले में एक दलाल पर वेश्यावृत्ति कराने का मुकदमा दर्ज किया गया है।

बालिग युवतियों को अपनी इच्छा से आने – जाने और पसंद का काम करने का मौलिक अधिकार है। तीनों युवतियों ने मजिस्ट्रेट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी – कि उनकी इच्छा के बिना उन्हें रिमांड होम में कैद किया गया है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि तीनों युवतियों को पीडि़त मानकर मुकदमा चलाया जा रहा है सो उनकी कैद अवैधानिक है। मजिस्ट्रेट किसी पीडि़त को उसकी इच्छा के बिना तीन सप्ताह से अधिक सुधार गृह में रखने के आदेश पारित करने को सक्षम नहीं है।

ऐसे भी साक्ष्य नहीं मिले हैं कि तीनों युवतियां पब्लिक प्लेस में वेश्यावृत्ति के लिए किसी को बहका रही थी और ना ही कोई वेश्यालय चलाती हैं। ऐसा कोई कानून नहीं है कि वेश्यावृत्ति को अपराध ठहराया जाये या कोई वेश्यावृत्ति करता है तो उसे सजा दी जाये।

कानून में शारीरिक शोषण या किसी व्यक्ति का व्यवसायिक इस्तेमाल या पब्लिक प्लेस में वेश्यावृत्ति के लिए किसी को बहकाना अपराध की श्रेणी में आता है।

पदचिह्न टाइम्स ।

 

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