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लोकतंत्र पर्व पर सत्ताधारियों के बिगड़े बोल विपक्ष को धोबी के घर का – ना घाट का बता दिया !

पूर्व केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री हरीश रावत के प्रति गृहमंत्री का कटाक्ष शालीनता से परे।

लोकतंत्र पर्व पर सत्ताधारियों के बिगड़े बोल विपक्ष को धोबी के घर का – ना घाट का बता दिया !
पूर्व केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री हरीश रावत के प्रति गृहमंत्री का कटाक्ष शालीनता से परे।

विधानसभा 2022 का चुनाव कई मायनों में यादगार बना है – मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्रीमती सौजन्या ने पूरे कौशल के साथ लोकतंत्र के चुनावी महापर्व को अपनी प्रशासनिक क्षमता से सहज उत्सव  बनाया है। ।

उत्तराखंड के दुर्गम बर्फीले मतदान स्थलों तक निर्वाचन को सफल बनाने में जुटे  80 हजार  स्टेट, सेंटर  व सरकारी संस्थानों  के कर्मियों के साथ  40 हजार सुरक्षा कर्मियों ने भी इस यज्ञ में अपने श्रम की आहुति दी है।

श्रीमती सौजन्या ने राज्य  में  भाईचारे की परम्परा अनुरूप मतदान पूरा कराने  हेतु पोलिटिकल पार्टी, नेताओं और मतदाताओं का आभार व्यक्त किया है।

70 विधानसभा सीटों के लिए 11696 बूथ बनाए गए। 9385 पोलिंग पार्टियां निर्वाचन संपन्न कराके जिले के स्ट्रांग रूम में ईवीएम उसी रात तक जमा कराती रही हैं।

दूरस्थ स्थलों पर तैनात शेष  निर्वाचन अधिकारी अगले दिन स्ट्रांग रूम तक पहुंच पाए।

कोरोना प्रोटोकाल का पालन करते हुए मुख्य निर्वाचन अधिकारी श्रीमती सौजन्या की घोषणा के अनुरूप हर बूथ पर पहले वोटर की थर्मल स्क्रीनिंग हुई।

साथ ही सभी वोटरों को डबल लेयर मास्क और एक दस्ताना निशुल्क उपलब्ध कराया गया – ताकि संक्रमण को लगभग शून्य रखा जाए।
उत्तराखंड में औसत मतदान  65 प्रतिशत रहा और अंतिम डाटा अभी आना शेष है।

उत्तराखंड में सत्ताधारी बीजेपी के स्टार प्रचारकों ने कई बार भाषा की शालीनता को लांघा है।
कांग्रेस के चुनाव अभियान प्रभारी पूर्व केंद्रीय मंत्री व पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखंड को धोबी का … घर का, ना घाट कह कर अपनी मर्यादा का उल्लंघन किया।

असम के मुख्यमंत्री ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और चार बार के लोकसभा सांसद राहुल गांधी के डीएनए टेस्ट जैसे अपशब्द अपने भाषण में उग्रता फैलाने के लिए इस्तेमाल किए हैं।
हरीश रावत को हारने की आदत है, बेचारे जैसे शब्द या .. कांग्रेस अपने कर्मों की सजा भुगत रही है।

विपक्ष का उत्तराखंड से सफाया कर दो जैसे नारे संसदीय व्यवस्था के लिए घातक है।

सरकार का अपनी पार्टी के प्रचार में शालीनता भंग करना लोकतंत्र के लिए घातक है। कई ऐसे वीडियो वायरल हुए हैं – जो चुनाव की दृष्टि से अनैतिक हैं। चुनाव आयोग को इनका संज्ञान लेना जरुरी है।

चुनाव के रौ में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्रियों को विपक्ष के लिए सदन में और सदन के बाहर गैर संसदीय भाषा का इस्तेमाल संघर्ष व कटुता बढ़ा सकता है।

संसद और विधानसभा के निर्वाचित प्रतिनिधि सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं ?

लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष दोनों देश की जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं। मजबूत विपक्ष सत्ता को बेइमानी और मनमानी रोकने के साथ, हमेशा जवाबदेह बनाता है।

उत्तराखंड की 70 सीटों के चुनाव परिणाम अब 10 मार्च को मतगणना संपन्न होने पर आयेंगे।

पांचवी विधानसभा के लिए बीजेपी, कांग्रेस व बसपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, उत्तराखंड क्रांति दल, वामपंथी दलों के साथ कई मजबूत निर्दलीय प्रत्याशी भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रहे हैं।

लोकतंत्र और चुनाव का प्रमुख अभिप्राय विपक्ष को बरदाश्त करना भी है। लेकिन कहीं विपक्ष या विरोध करने वाले निर्वाचित नेताओं  को देशद्रोही बताने जैसी खतरनाक सोच भी उभरने लगी है।

समाज के ध्रुवीकरण और विघटन को रोकने के लिए किताबी शिक्षा से ज्यादा नेताओं को अपनी बोली, भाषा व व्यवहारिक ज्ञान को जिम्मेदार बनाने की जरूरत है।
— भूपत सिंह बिष्ट

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