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मालिनीथान की कथा – जब पार्वती ने रूकमणी और कृष्ण को फूल दिए !

अरूणाचल के प्रवेश द्वार लिकाबाली, लोअर सियांग जनपद में पुरातत्व विभाग की खुदाई में मिले हैं भव्य मंदिर के अवशेष।

मालिनीथान की कथा – जब पार्वती ने रूकमणी और कृष्ण को फूल दिए !
अरूणाचल के प्रवेश द्वार लिकाबाली, लोअर सियांग जनपद में पुरातत्व विभाग की खुदाई में मिले हैं भव्य मंदिर के अवशेष।

 

भारत की तमाम विविधता में एकता का समावेश करता एक अनोखा पूजा स्थल मालिनीथान अब सनातन संस्कृति की धरोहर है।
अरूणाचल प्रदेश की आठ सौ किमी से अधिक सीमा असम प्रदेश के आठ जनपदों के साथ सटी है। ऐसे ही असम के नगर

सिलापथार (धामेजा जनपद) की सीमा पर लिकाबाली ( लोअर सियांग जनपद ) अरूणाचल का प्रवेश द्वार है।

तिब्बत से आने वाली सियांग नदी अरूणाचल के बाद ब्रह्मपुत्र कही जाती है। ब्रह्मपुत्र हमारे देश में एक मात्र ऐसी नदी है जिसे पुरूषवाचक संज्ञा से पुकारा जाता है।
लिकाबाली से एक किलोमीटर की दूरी पर माँ दुर्गा का – मालिनीथान मंदिर मौजूद हैं।
वसंत पंचमी, रामनवमी और नवरात्रि पर्व पर माँ भगवती के मालिनन स्वरूप की पूजा – अर्चना के लिए यहाँ हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मालिनी मेला का आयोजन मालिनीथान में 1968 से दर्ज किया जा रहा है।

असम के राजाओं द्वारा माँ रूकमणी – श्रीकृष्ण के प्राचीन मंदिर ईंट पत्थरों से निर्मित कराये जाते रहे हैं और उनकी वास्तु और मूर्तिकला में काफी समानतायें हैं।


इस मंदिर की रोचक कथा इस प्रकार है – श्री कृष्ण ने अपनी महारानी रूकमणी के साथ विवाह कर यहाँ रात्रि विश्राम किया और फिर अपनी राजधानी द्वारका के लिए रवाना हुए।
विवाह में परिवार की स्वीकृति न होने से श्री कृष्ण को भारी संघर्ष कर माँ रूकमणी को द्वारका ले जाना पड़ा था।
माँ पार्वती ने यहां सुंदर फूलों का बगीचा सजाया हुआ था। शिव – पार्वती ने नव दम्पति – श्री कृष्ण – रूकमणी का हार्दिक स्वागत पुष्पों के साथ किया और आशीर्वाद दिया।
भगवान श्री कृष्ण ने माँ पार्वती को मालिन का संबोधन दिया और मालिनीथान को माँ भगवती, पार्वती, श्री दुर्गा या मालिनी नाम से अराधना शुरू हो गई।
कालांतर में शिव – पार्वती भी बैकुंठ धाम चले गए।


1968 में पुरातत्व विभाग ने मालिनीथान के खंडित मंदिर स्थल पर खुदाई की और मूर्तियों व मंदिर अवशेष का सुंदर विश्लेषण किया। ऐसा माना जाता है कि भूकंप में खंडित मंदिर बारह सौ वर्ष पुराना है और उड़ीसा की नागर शैली में पत्थरों से निर्मित हुआ है।
मंदिर के ध्वस्त अवशेष में माँ पार्वती और शिव, गणेश और कार्तिकेय , ऐरावत हाथी, सिंह द्वार, अप्सरायें और कामदेव, इंद्रदेव और हाथ में पुष्प लिए महिलाओं की मुद्रायें शिलाओं में उकेरी गई हैं।
मंदिर के परकोटे, गर्भ गृह और दीवारों पर कमल और कलियां, फूल और बेलबुटे आकर्षक ढंग से तराशे गये हैं मानों माँ पार्वती जी एक भव्य बगिया की मालिन रही हैं।
अनेक प्रयासों के बाद भी ऐतिहासिक मंदिर का शिवलिंग पुरातत्व विभाग की टीम नहीं खोज पायी है।
2018 में मालिनीथान विकास समिति के प्रयासों से ढाई करोड़ की लागत से माँ दुर्गा का नया मंदिर निर्माण किया जाने लगा। मार्च 2019 में भूमि पूजन के बाद पुराने मंदिर की नींव पर नए मंदिर ने शानदार आकार ले लिया है।
माँ दुर्गा अपने त्रिशूल से महिषासुर का संहार कर रही हैं और भगवती के शेर ने असुर के कंधे को दबोचा हुआ है।
मंदिर के पुराने जल संभरण को भी अरूणाचल पुरातत्व विभाग सुधारने में कामयाब हुआ है। मंदिर के पीछे ध्वस्त मंदिर की मूर्तियों को फोटोग्राफी के उपरांत क्रमबद्ध रखा गया है।
– भूपत सिंह बिष्ट, स्वतंत्र पत्रकार।

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