टाउनहाल देहरादून में सजीव हुए कालजयी रचना गोदान उपन्यास के पात्र !
वातायन नाटय संस्था ने अपने 45 वर्षों के सफर में एक और सुंदर प्रस्तुति दी - गोदान।

टाउनहाल देहरादून में सजीव हुए कालजयी रचना गोदान उपन्यास के पात्र !
वातायन नाटय संस्था ने अपने 45 वर्षों के सफर में एक और सुंदर प्रस्तुति दी – गोदान।

देहरादून के समर्थ कलाकारों ने इस बार मुंशी प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास गोदान के पात्रों को मंच पर अपने
अभिनय से सजीव किया है।
हमारे कृषि प्रधान समाज में होरी और धनिया के पात्र एक ऐसे दम्पति हैं – जो धरती से अन्न पैदाकर तंगहाली में
जीकर भी पूरे समाज को समृद्ध करते हैं।
किसानों की उपज को लूटने के लिए साहूकार ऋण – धंधे में सक्रिय हैं तो पंडित कर्मकांड से वसूली का
धंधा चला रहा है।
होरी को अपनी उपज पर जागीरदार को लगान भी चुकाना है और अपने समाज में रहने के लिए
पंचों की लूट खसोट के प्रपंच को भी बरदाश्त करना है।
होरी का बेटा गोबर और उस की पत्नी झुनिया परंपराओं के धुर विरोधी हैं।
बाल विधवा झुनिया का गोबर से प्रेम विवाह और शहर की ओर पलायन परिवर्तन की बयार है।
होरी किसान का सपना है – कभी ऋण के जंजाल से छूटे तो आंगन में गाय का पुण्य लाभ ले।
धनिया अपने ससुराल में अभावों और ऋण के जाल में उलझी – गृहस्थी धर्म निभाती है।
किसान पति की मौत पर गोदान तो नहीं कर पाती लेकिन कुछ रूपयों से पंडित को मोक्ष द्वार खोलने
की कातर विनती करती है।
भारतीय किसान की गाथा गोदान को नाटक में रूपांतर करने का श्रेय लेखक व निर्देशक मंजुल मंयक मिश्र ने लिया है।
गोदान फिल्म 1963 में बनी थी जिसके मुख्य कलाकार राजकुमार, कामिनी कौशल, शशिकला और महमूद थे ।
फिल्म का निर्देशन त्रिलोक जेटली और पटकथा प्रेमचंद ने खुद लिखी थी।
इस बार विश्व रंग मंच दिवस पर गोदान प्रस्तुति वातायन संस्था की सौगात रही।
फिर भी गोदान फिल्म के दृश्य नाटक में हु – बहु देखने को मिल गए।
मुंशी प्रेमचंद उर्फ धनपत राय ने हिंदी और उर्दू साहित्य को काफी समृद्ध किया है।
मुंशी प्रेमचंद के गबन और गोदान उपन्यासों पर बंबई सिनेमा फिल्में बना चुका है।
गोदान पर दो घंटे का नाटक उठाना दूनघाटी के प्रतिभावान कलाकारों के दम पर संभव हुआ है।
होरी की भूमिका में धीरज सिंह रावत, धनिया बनी सोनिया नौटियाल गैरोला अपनी छाप छोड़ने में सफल हैं।
देहरादून रंगमंच के मंझे हुए कलाकार नवनीत गैरोला, प्रदीप घिल्डियाल, रमेंद्र कोटनाला,
सोनिया वालिया, शुभम बहुगुणा और वीरेंद्र गुप्ता ने भी अपने पात्रों के साथ न्याय किया है।
नाटक के कुछ दृश्य फिल्म की तर्ज पर बहुत छोटे रह गए हैं और नाटक के प्रवाह को भंग करते हैं।
— भूपत सिंह बिष्ट