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डायरी : अरूणाचल जीवन एक युग बीता – शिक्षक और शिष्य परम्परा !

हिमालयी राज्यों में जीवन में उर्जा, परम्परा और संस्कृति का लुप्त होना मशीनीकरण और तकनीक का दुष्प्रभाव — भूपत सिंह बिष्ट

डायरी : अरूणाचल जीवन एक युग बीता – शिक्षक और शिष्य परम्परा !

हिमालयी राज्यों में जीवन में उर्जा, परम्परा और संस्कृति का लुप्त होना मशीनीकरण और तकनीक का दुष्प्रभाव — भूपत सिंह बिष्ट

आज जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर एक बार फिर, कक्षा पाँचवी और छठी की मेरी छात्राओं ने गौरवांवित किया है।

केजांग, आज अरुणाचल सरकार से पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका और लुप्सी अब सफल उद्यमी हैं – दोनों अपने जीवन में आर्थिक प्रगति के सफल उदाहरण हैं।

1982 में केंद्र शासित सरकार के शिक्षा विभाग में सुदूर और सुंदर नेफा अंचल में नियुक्ति मिली — निसंदेह यह क्षेत्र तब अनेक सुविधाओं में हमारे उत्तराखंड से पीछे चल रहा था लेकिन आज विकास और रोजगार में यह इक्कीस साबित हुआ है।

आजादी के बाद स्थापित इस स्कूल में मेरा योगदान अगर छात्र – छात्रायें यूं सम्मान देकर मानते हैं तो जीवन की सार्थकता बहुत संतोष प्रदान करती है।

मेरे पढ़ाये बच्चे भारत सरकार और अपने समाज में प्रभावी दायित्व निभा रहे हैं। उन की सफलता भी मेरी विरासत है।

षष्टी पूर्ति पर मुझे सेवानिवृत्त होना था और मेरे छात्र – छात्रायें मुझे स्नेह और सम्मान से कृतज्ञ कर रहे हैं — निसंदेह बाबा केदारनाथ और पितृजनों का आशीर्वाद है।

1982 की मेरी कर्मस्थली रुपा सकैंडरी स्कूल, मेरे सहकर्मी और अरूणाचल सब उत्साहित करते हैं।
– भूपत सिंह बिष्ट

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