बीजेपी ने जीत ली फिर बागेश्वर सीट अब पार्वती दास नई विधायक !
उत्तराखंड उपचुनाव बागेश्वर के नतीजे दे रहे कई सारे संकेत - आगे राह आसान नहीं।

बीजेपी ने जीत ली फिर बागेश्वर सीट अब पार्वती दास नई विधायक !
उत्तराखंड उपचुनाव बागेश्वर के नतीजे दे रहे कई सारे संकेत – आगे राह आसान नहीं।
- विश्लेषण दिनेश शास्त्री सेमवाल
बागेश्वर विधानसभा उपचुनाव मामूली अंतर से भाजपा जीत जरूर गई है
लेकिन मत प्रतिशत ने उसकी चिंता भी बढ़ा दी है।
बेहद करीबी मुकाबले में आकर कांग्रेस ने उसे बैकफुट पर ला दिया है।
खास बात यह है कि एन डी तिवारी, विजय बहुगुणा और हरीश रावत के
उपचुनावों को छोड़ दें तो पहली बार कांग्रेस उपचुनाव लड़ती हुई दिखी है।
मुख्यमंत्री का चुनाव स्वाभाविक रूप से एकतरफा होता है लेकिन इससे पहले थराली और
उसके बाद सल्ट के उपचुनाव में कांग्रेस ने इतनी गंभीरता नहीं दिखी थी।
निसंदेह ये तीनों उपचुनाव सहानुभूति की लहर पर सवारी के रहे
किंतु चुनाव का नतीजा एक संदेश तो देता ही है।
बागेश्वर के उपचुनाव में मतदाताओं ने कोई उत्साह नहीं दिखाया, यह वहां के मतदान
प्रतिशत से स्पष्ट होता है।
सवा साल पहले इस सीट से चंदन राम दास 32211 वोट लेकर जीते थे,
तब कांग्रेस को 20070 वोटों से संतोष करना पड़ा है।
इस बार पिछले साल के मुकाबले करीब साढ़े चार फीसद कम मतदान हुआ
तो भाजपा की पार्वती दास को मात्र 32192 वोट ही मिल पाए।
जाहिर है अगर सिर्फ सहानुभूति का ही मामला होता तो जीत का अंतर
ज्यादा होना चाहिए था लेकिन भाजपा पुराने आंकड़े पर ही सिमट कर रह गई
इसके विपरीत कांग्रेस बेहद करीब आकर 29382 वोट जुटाने में सफल रही।
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए क्या संदेश है – उसे सहज ही
पढ़ा जा सकता है।
उपचुनाव बागेश्वर के मैदान में पार्वती दास अकेली नहीं थी, उसके साथ पूरी सरकार
और सबसे बड़ी पार्टी का संगठन भी था।
उस लिहाज से परिणाम आशातीत है लेकिन भविष्य के लिए बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं है।
उधर कांग्रेस के लिए हार के बावजूद भविष्य के लिए अच्छे संकेत उभरते दिख रहे हैं।
पूर्व कैबिनैट मंत्री स्व. चंदन राम दास की बेटी का पिछले दिनों कम अंक के
बावजूद चिकित्सक के रूप में चयन का मामला खूब गरमाया था।
उसके साथ ही बेरोजगार संघ के अध्यक्ष बॉबी पंवार की गिरफ्तारी के मामले ने
भाजपा विरोधी माहौल बनाया लेकिन कांग्रेस उसे ठीक से भुना नहीं पाई या यूं कहें
कांग्रेस के वोट प्रतिशत में वृद्धि में संभवता यह भी एक कारक रहा है।
बहरहाल इतना तय है कि भाजपा कैंप में चुनाव की जीत का संतोष जरूर रहेगा
किंतु वह उत्साह जीत के बेहतर अंतर से कम है।
साफ और खरी बात यह है कि यदि जीत का अंतर चंदन राम दास की जीत से ज्यादा
या इक तरफा होता तो उसे पूरी तरह सहानुभूति की लहर के रूप में गिना जा सकता था।
अब आगे नगर पालिका और लोकसभा चुनावों की बिसात बिछने जा रही है।
पूरे देश के उपचुनाव पर नज़र डाले तो बीजेपी सात में से तीन उपचुनाव जीती है और
चार पर इंडिया गठबंधन बाजी मार गया।
उत्तर प्रदेश में घोसी उपचुनाव समाजवादी पार्टी की झोली में गया है।
— दिनेश शास्त्री सेमवाल