गढ़वाल दर्शन : श्रद्धा, विश्वास और आस्था की त्रिवेणी – त्रियुगीनारायण धाम !
25 सितम्बर से अद्भुत बामन द्वादशी मेला - निसंतान दंपत्तियों की मनोकामना पूर्ण करते हैं श्री नारायण।

गढ़वाल दर्शन : श्रद्धा, विश्वास और आस्था की त्रिवेणी – त्रियुगीनारायण धाम !
25 सितम्बर से अद्भुत बामन द्वादशी मेला – निसंतान दंपत्तियों की मनोकामना पूर्ण करते हैं श्री नारायण।
— दिनेश शास्त्री, वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार
भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह स्थल त्रियुगीनारायण, पौराणिक महत्व का तीर्थ
होने से निसंतान दंपत्तियों की मनोकामना पूर्ण करने वाला तीर्थ है।
इस तीर्थ में तीन युगों से जल रही – अखंड धूनी, इसके महत्व को न सिर्फ निरूपित करती है
बल्कि लोगों की आस्था और विश्वास को भी पुष्ट करती है।
उत्तराखंड में कई देवस्थान निसंतान लोगों की मनोकामना पूर्ण करने के लिए प्रसिद्ध हैं।
चमोली में मंडल के निकट अनुसूया माता का मंदिर हो या श्रीनगर में
वैकुंठ चतुर्दशी का पर्व या नंदा के तीर्थ।
इन्हीं में एक त्रियुगीनारायण भी है – जहां बरोही दंपती रात्रि जागरण कर
बामन द्वादशी पर सुफल पाते हैं।
लोक मान्यता है कि भगवान नारायण , जिन दंपतियों को फल प्रदान करते
हैं -उनके सुने आंगन में साल भर के भीतर किलकारी गूंजने लगती है।
श्री दुर्वाष्टमी पर्व पर आगामी 22 सितम्बर को इस पारंपरिक उत्सव तथा एक तरह से
लोक द्वारा अभिहित पुत्रेष्ठी यज्ञ की शुरुआत हो जायेगी।
त्रियुगीनारायण मंदिर के अधिकारी परशु राम गैरोला ने बताया – यह वार्षिक उत्सव
25 सितम्बर को जलझूलनी एकादशी के पर्व पर बृहदाकार लेगा।
उस रात्रि दर्शन के साथ संतान कामना के निमित्त अनुष्ठान करने वाले दंपत्ति रात्रि जागरण करेंगे।
उस रात्रि बरोही हाथों में दीपक लेकर साधना करते हैं। वामन द्वादशी को
वामन जयंती मेला 26 सितम्बर को होगा।
पहले भैरव नाथ के पश्वा अवतरित होते हैं और उसके बाद नारायण के पश्वा बरोहियों को
फल प्रदान कर उनके मनोरथ पूर्ण होने का आशीर्वाद देते हैं।
यही परम्परा माता अनुसूया देवी और श्रीनगर के बैकुंठ चतुर्दशी मेले
में भी है। इसके अतिरिक्त
अंदरवाड़ी, देवशाल और रविग्राम में बीं माई का हर तीसरे साल होने वाला
उत्सव इन्हीं लोक परंपराओं का अंग है।
परशुराम गैरोला ने एक अपील में कहा – समस्त सनातन धर्मावलंबियों का इस उत्सव में
स्वागत है और प्रभु से सभी के लिए शुभ आशीर्वाद की कामना करते हैं।

दूरदर्शन से सेवानिवृत्त वीडियो अधिशासी और लोक संस्कृति के विशिष्ट अध्येता
डॉ. ओमप्रकाश जमलोकी मानते हैं – त्रियुगीनारायण तीर्थ वैदिक, पौराणिक तथा
लोकव्यवहार का समन्वय है।
डॉ. ओमप्रकाश जमलोकी मानते हैं यह मूलत: वैदिक तीर्थ है जिसमें अग्नि को
प्रमुखता दी गई है।
वेदों में इंद्र के बाद अग्नि को ही सर्वाधिक महत्व दिया गया है।
शिव पार्वती का विवाह चूंकि इसी स्थान पर हुआ।
राजा हिमवंत और मैनावती का कोई पुत्र न होने के कारण भगवान नारायण ने
पार्वती के भाई की भूमिका निभाई सो यह स्थान नारायण को समर्पित है।
डॉ.जमलोकी के अनुसार यहां तीसरी शताब्दी की एक प्रतिमा मिली है।
इस के कालक्रम की पुष्टि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने की है। डॉ.जमलोकी बताते हैं – त्रियुगीनारायण का
वर्तमान मंदिर तेरहवीं शताब्दी के आसपास का है।
मान्यतानुसार इस मंदिर का निर्माण भिलंग के किसी राजा ने किया था।
इस मंदिर के शिखर पर नाथ पंथ के प्रवर्तक आदिनाथ की प्रतिमा विराजमान है।
नाथ पंथ को रुद्रावतार भी माना गया है और इसी क्रम में गुरु गोरखनाथ ने भी
यहीं तपस्या की और उसके बाद यहां लोक देवताओं के मंदिर भी स्थापित हुए।
इस कारण यह वैदिक, पौराणिक और लोक मान्यताओं का समुच्चय बन गया है।
यही त्रियुगीनारायण तीर्थ की विशेषता है और इसे अन्य तीर्थों से अलग करती है।
आजकल इस धाम में विवाह समारोह आयोजन करना एक पुनीत कार्य बना है।
इस तरह के आयोजनों के साथ कुछ अवांछित कृत्य, जैसे शांत वातावरण में डीजे की गूंज
कई बार वन्य जीवों ही नहीं स्थानीय निवासियों के लिए भी अप्रिय – पीड़ादायक
महसूस होती है।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि नारायणकोटी की तरह यहां भी अनेक मंदिर समूह
थे और यदा कदा उनके प्रमाण खेती किसानी के दौरान मिल भी जाते हैं। नारायणकोटी में
अब गिनती के मंदिर ही दिखते हैं, उसी तरह यहां भी कुछ ही मंदिर दिखते हैं।
तीर्थयात्रियों को दर्शन कराने का दायित्व स्थानीय लोगों के पास है। वैसे यह मंदिर भी
श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अधीन है लेकिन स्थानीय निवासियों के हक
सुरक्षित रखे गए हैं।
त्रियुगीनारायण मंदिर की अवस्थापना :-
माँ गंगा को हमारे धर्मग्रंथों में विष्णु पत्नी माना जाता है। यहां गर्भगृह में नारायण के चरण
गंगा पखारती है।
गर्भ गृह में एक छोटा सा जल कुंड इसका प्रमाण है और वहीं से निकला जल
इस धाम के सप्त कुंडों में प्रवाहित होता है।
गर्भगृह में नारायण के विग्रह के साथ ही शालिग्राम समूह है तो पास ही गणेश जी
स्थापित हैं। किंतु मूल मंदिर भगवान विष्णु को ही समर्पित है।
पिछले एक दशक से यहां तीर्थयात्रियों का आना वर्षभर लगा रहता है।
लोगों की बढ़ती आवाजाही के चलते अवस्थापना सुविधाएं भी तेजी से विकसित हुई हैं।
यात्रा सुगम होने से लोग आध्यात्मिक सुख की अनुभूति करते हैं। आने वाले समय में यहां
व्यवस्थित कल्याण मंडपम – विवाह स्थल , तीर्थाटन और अधिक बढ़ने की संभावना है
और इसका स्वाभाविक लाभ स्थानीय निवासियों को होगा।
- दिनेश शास्त्री सेमवाल।