नंदा तू राजी खुशी रैंया – उत्तराखंड क्षय रोग उन्मूलन में सक्रिय हेमलता बहन !
एक्शन फार एडवांसमेंट आफ सोसाइटी - आस के युवा स्वयं सेवक ऋषिकेश की मलीन बस्तियों में क्षय रोगियों को तलाशकर देते हैं उपचार में राहत।

नंदा तू राजी खुशी रैंया – उत्तराखंड क्षय रोग उन्मूलन में सक्रिय हेमलता बहन !
एक्शन फार एडवांसमेंट आफ सोसाइटी – आस के युवा स्वयं सेवक ऋषिकेश की मलीन बस्तियों में क्षय रोगियों को तलाशकर देते हैं उपचार में राहत।
ऋषिकेश की बस्तियों में भी रोजी – रोटी के संघर्ष में उलझे गरीब परिवार सिर उठाकर जीने के लिए रोजना रोजगार की तलाश में निकलते हैं। कभी मजदूरी मिली, तो कभी मौसम या अनहोनी की मार ने दैनिक आय को लील लिया।
ऐसे में दो जून की रोटी जीवन की अग्नि परीक्षा है। अगर परिवार साथ हो तो मां – बाप के लिए रोटी, कपड़ा और शिक्षा मुहैया कराना ज्वलंत समस्या बना रहता है।
गरीब मजदूर के अच्छे दिन तो उसकी रोज की दिहाड़ी पर निर्भर है। बच्चे को शिक्षा, रोटी, कपड़ा और मकान सिर्फ पोलिटिकल पार्टियों की रैली में ही जुमलों में उछाले जाते हैं।
परिवार में बीमारी तो अनहोनी की मार है – ईश्वर की कोप दृष्टि, पता नहीं कैसे हर बार गरीबों को ढूंड लेती है ?
उत्तराखंड की विभिन्न एनजीओ – गैर सरकारी संस्थाओं में सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तीन दशक से सक्रिय हेमलता बहन कहती हैं – भले ही क्षय रोग या टीबी बलगम जांच के बाद ही तय होती है।
गरीब परिवारों में क्षय रोग का अंदाजा लगाने के लिए उनकी निरंतर खांसी, कृश काया, कुपोषण, गिरता वजन और झोपड़ पट्टी का जीवनयापन काफी निशान हैं।

एक्शन फार एडवांसमेंट आफ सोसाइटी – आस संस्था गरीबों के बीच क्षय रोग उन्मूलन के लिए नंदा तू राजी, खुशी रैंया सोच के साथ सक्रिय है।
उत्तराखंड में हर बेटी नंदा देवी की तरह राजी – खुशी और खुशहाल रहे – ऐसे मूल मंत्र के साथ बच्चों को हेमलता बहन का स्नेह और प्यार मिलता है।
आज की स्वस्थ बेटी ही कल तंदुरूस्त मातृत्व को वहन कर सकती है।
आस संस्था के स्वयं सेवक वालंटियर बस्तियों की झोपडि़यों में गरीब बालिकाओं और अशक्त महिलाओं को तलाशकर हास्पीटल तक लाती हैं।
वालंटियर रोगी की प्रेरणा बनती हैं। क्षय रोग की दवाइयां तो हास्पीटल में सुलभ हैं मगर रोगी की झिझक दून करने, सावधानी बरतने और सबसे प्रमुख पौष्टिक आहार से परिचय कराने में आस के स्वयंसेवक देवदूत बने हैं।
गरीब लोगों को पौष्टिक यानि प्रोटीन भोजन उपलब्ध कराने में भी आस सामाजिक दायित्व निभा रही है।
हेमलता बहन बताती हैं – नए कानूनों में टीबी रोगी की पहचान सार्वजनिक नहीं की जा सकती है। फिर भी समाज में फैल अंध विश्वास और कुरीतियों के चलते टीबी रोगी को कुंठा में जीना पड़ता है।
आस में कई वालंटियर क्षय रोग की पीड़ा को सहन कर चुके हैं और इस त्रासदी से बाहर आने के बाद टीबी उन्मूलन में स्वयं सेवक की कुशल भूमिका निभा रहे हैं।
आस की एक वालंटियर सविता अपनी फील्ड डायरी में लिखती हैं –
आज सुबह हमारी टीम हास्पीटल में एकत्रित हुई। बैटरी रिक्शा में हम लोग मायाकुंड बस्ती पहुंचे।
घर – घर जाकर आर्थिक सर्वेक्षण और टीबी संभावना को तलाश किया। जिन बच्चों को टीबी के लक्ष्ण दिखे 7 उनके मां बाप को हौंसला और आस बंधाई।
रोग ग्रस्त परिवारों की बहुत सी परेशानियां सुनी। अक्सर हर परिवार में एक ही कमाने वाला होने से आर्थिक हालात दयनीय हैं।
अधिकतर परिवार एक कमरे में ही गुजर बसर कर रहे हैं और ऐसे में क्षय रोग आसानी से दूसरे सदस्य में फैल सकता है।
गंदगी और कुपोषण टीबी फैलने के बड़े कारण देखने में आ रहे हैं। हेमलता दीदी के मार्ग दर्शन से हम पीडि़त परिवारों के बीच सरलता से घुलमिल पा रहे हैं और रोगी बहनों का विश्वास जीतने में कायम हुए।
प्रोटीन डायट के किट देकर हमने रोग पीडि़त परिवार को विश्वास दिलाया कि हम इस रोग के उन्मूलन तक उन के साथ खड़े हैं।
गरीब परिवार आस संस्था के बारे में तमाम जानकारी पाना चाहते हैं। हमारी वालंटियर टीम ने मिल जुल कर पूरी बस्ती का डाटा बेस बनाया है।
माह में कुछ दिन हम आस के निर्देशन में क्षय रोग के उन्मूलन में इसी तरह सहयोग करना चाहेंगे।
– भूपत सिंह बिष्ट