महाशिवरात्री पर्व पर आलौकिक शिवभूमि कैलाश के दिव्य दर्शन !
जीवन में एक बार इस धरती पर अवस्थित भगवान शिव का निवास - कैलाश की यात्रा अद्भुत और अनन्य ।

महाशिवरात्री पर्व पर आलौकिक शिवभूमि कैलाश के दिव्य दर्शन !
जीवन में एक बार इस धरती पर अवस्थित भगवान शिव का निवास – कैलाश की यात्रा अद्भुत और अनन्य ।
हिमालय में तिब्बत को संसार की छत कहा जाता है – जहां सबके प्रिय और आराध्य भगवान शिव की नगरी कैलाश स्थित है।
कैलाश पर्वत की परिक्रमा लगभग 45 किमी की है और 18 हजार फीट से अधिक कम आक्सीजन में पदयात्रा करनी है।
परिक्रमा के दौरान कैलाश पर्वत की छवि कई आकार और रंग लेती है।
तिब्बत के शहर दारचेन से तो कैलाश पर रस्सी के आकार प्रकट होते हैं – जिस की कथा है कि शिव के अनन्य भक्त लंकेश रावण को वरदान में कैलाश को लंका ले जाने का वरदान मिल गया।
बिना ज़मीन में उतारे शिव निवास कैलाश पर्वत को लंका पहुंचाना था और रावण ने रस्सियों से कैलाश पर्वत को बांधकर ले जाने का असफल प्रयास किया।
यमद्वार से कैलाश पर्वत की परिक्रमा का श्रीगणेश होता है। एक छोटे तोरणद्वार से गुजरना पड़ता है और मौक्ष प्राप्ति मिलती है।
डेरापुक में रात्री निवास सबसे कठिन अनुभव है और भोले की भूमि में जीवन की दुरूहता का अहसास हो जाता है।
डेरापुक से डोलमा पास को पारकर परिक्रमा का अंतिम और सुगम पथ मानसरोवर के किनारे पहुंचता है।
डोलमा पास अठारह हजार पांच सौ फीट पर है और इस ऊंचाई पर सबसे ज्यादा तीर्थयात्री प्राण त्याग चुके हैं।
कैलाश परिक्रमा का सुख जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा का पुरस्कार है। कैलाश पर्वत की परिक्रमा में शैव मत अनुयायी, बौद्ध और जैन धर्म के उपासक भी शामिल रहते हैं।
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भूपत सिंह बिष्ट।