दिल्ली में उकेरी गई – उदंकार फिल्म निर्माण में लगे थे चार साल !
निर्माता, निर्देशक और संपादक सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने उदंकार में अपने रंगीले सपने को सजाया।

दिल्ली में उकेरी गई – उदंकार फिल्म निर्माण में लगे थे चार साल !
निर्माता, निर्देशक और संपादक सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने उदंकार में अपने रंगीले सपने को सजाया।

उत्तराखंडी सिनेमा के लिए बुनियाद बनी प्रारंभिक फीचर फिल्म उदंकार, जग्वाल और
समलौण का निर्माण अपनेआप में रहस्यभरे कथानक है।
उदंकार फिल्म के निर्देशक सुरेंद्र सिंह बिष्ट विगत सप्ताह स्वर्गवासी हो गए।
उन की उम्र 75 वर्ष थी। स्वर्गीय बिष्ट दूरदर्शन व राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान परिषद के लिए बनने
वाली फिल्मों के एडिटर रहे हैं।
बम्बई मायानगरी से बाहर दिल्ली में गढ़वाली सिनेमा का निर्माण हमेशा पहाड़ सी चुनौती
बना है। पांच दशक पहले तो गढ़वाली फिल्म निर्माण एवरेस्ट चढ़ना ही था।
हिंदी फिल्मों के जादू से गढ़वाली – कुमांउनी जन मानस कभी दूर नहीं रहा है और आज
उत्तराखंड की छाप मुंबई सिनेमा और सीरियल के हर भाग में स्पष्ट दिखती है।
उदंकार फिल्म पहाड़ की सामाजिक – सांस्कृ तिक चुनौतियों को मीडिया के सहारे उठाने का
बीड़ा सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने 1982 वर्ष में लिया था।
दूरदर्शन और एनसीईआरटी के लिए फिल्म एडिटिंग से जुड़े सुरेंद्र सिंह बिष्ट ने उत्तराखंड के लिए
एक नई रोशनी – उदंकार का सपना बुना था।
दिल्ली में सक्रिय उत्तराखंड समाज के लिए ये फिल्मी प्रोजेक्ट कौतुहल और
उल्लास का जनक बना था।

रेडियो के भीष्म पितामाह देवकी नंदन पांडे, नेशनल स्कूल आफ ड्रामा से पास आउट चंद्र मोहन बौंठियाल,
दिल्ली थियेटर के कलाकार, गढ़वाली और कुमांउनी के गीतकार और गायकों ने
अपना श्रेष्ठ उदंकार फिल्म में दिया।

गढ़वाली फिल्म निर्माण में एक मुश्त पैसा लगाने वाला फाइनैंसर मिलना तब
सबसे असंभव काज साबित हुआ।
फलस्वरूप टुकड़ों – टुकड़ों में शूटिंग, संपादन और डबिंग के बाद फिल्म निर्माण
में चार साल का वक्त लग गया।
स्वाभाविक है कि स्टोरी लाइन में भी तमाम बदलाव हुए और कमानी थियेटर दिल्ली में प्रेस प्रीमियर का
आयोजन होने तक निर्माता – निर्देशक और सहायक अपना बहुत कुछ दाव पर लगा चुके थे।

उदंकार फिल्म के प्रीमियर में केंद्रीय मंत्री नारायण दत तिवारी पहुंचे। दिल्ली प्रेस जगत में सक्रिय तमाम
उत्तराखंडी भद्र पुरूषों की समालोचना के बाद भी फिल्म को टैक्स फ्री का दर्जा हासिल नहीं हो पाया।
लाखों की लागत से बनी उदंकार फिल्म के प्रोडक्शन से जुड़े नरेंद्र सिंह रावत याद करते हैं कि आंचलिक
फिल्म निर्माण की चुनौती उठाना अपने जीवन को दाँव पर लगाना था।
चार साल तक इस फिल्म के निर्माण में सहयोगी रहा। शूटिंग शैडयूल से लेकर, हिसाब – किताब रखना,
कलाकारों को रिहर्सल कराना, आंचलिक बोली सीखाना, वेशभूषा से लेकर फिल्म स्टाक जुटाना
सब कुछ एक महाभारत होता था।
हास्य कलाकार की भरपायी के लिए खुद भी अभिनय के लिए उतरना पड़ा।
ये प्रोजेक्ट फिल्म निर्माण की बारीकियां समझाने में उन के लिए मील का पत्थर रहा है।
काश, उदंकार हिट हो जाती तो संपादन विधा के विशेषज्ञ सुरेंद्र सिंह बिष्ट अपनी लोक कलात्मक
सोच वाली दूसरी आंचलिक फिल्मों का योगदान भी करते और उन्हें सक्रिय जीवन से बेलाग न होना पड़ता।
— प्रस्तुति भूपत सिंह बिष्ट