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उत्तराखंड का महानायक : महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत !

गढ़वाल राइफल का पहला महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत 21 साल की उम्र में शहीद हो गए।

उत्तराखंड का महानायक : महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत !

गढ़वाल राइफल का पहला महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत 21 साल की उम्र में शहीद हो गए।

1962 के भारत – चीन युद्ध की एक कहानी के असली हीरो हैं – 21 साल के राइफल मैन जसवंत सिंह रावत।

 

जसवंत रावत ने चीन के खिलाफ 1962 के युद्ध में चौथी गढ़वाल राइफल को विशिष्ट पहचान दिलाई।  देवभूमि के इस वीर योद्धा ने न सिर्फ अकेले 72 घंटे तक बिना कुछ खाए- पिये दुश्मनों से लोहा लिया। चीन के सैकड़ों सैनिकों को हताहत कर दिया।

जसवंत रावत की बहादुरी से दुश्मन चीन भी इतना प्रभावित हुआ कि लड़ाई ख़त्म होने के बाद उसने जसवंत सिंह की वीरता का विशेष उल्लेख किया।

आज महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत की एक ससम्मान प्रतिमा बलिदान स्थल जसवंत गढ़ , जंग, सेला टाप, अरूणाचल में सुसज्जित है।

जसवंत सिंह का जन्म 19 अगस्त 1941 में वीरोंखाल (पौड़ी) के बाडियूं गांव में हुआ। उनके पिता का नाम गुमान सिंह रावत था।
जसवंत सिंह मात्र 17 वर्ष की उम्र में ही सेना में भर्ती होने चले गए, हालांकि उम्र कम होने के चलते उन्हें भर्ती नहीं किया गया।

19 अगस्त 1960 को वह सेना में बतौर राइफल मैन भर्ती हो गए। 14 सितम्बर 1961 में उनकी ट्रेंनिग पूरी हुई।

अक्टूबर 1962 में चीन ने पहली बार भारत पर बड़ा हमला किया। नेफा आज का अरुणाचल देश के लिए चीन के खिलाफ एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा है।

1950 में चीन ने तिब्बत को पहले  अपने कब्जे में ले लिया था। फिर भारत के  तवांग से 35 किमी दूर 15 हजार 300 फीट की ऊंचाई पर स्थित बुमला पास पर अक्टूबर 1962 में  अचानक धावा बोल दिया।

कामेंग सेक्टर पर बुमला, टांगपेल ला, जिमीथांग और जंग पर चीनी सेना के साथ भारी युद्ध हुआ।

इस अप्रत्याशित युद्ध के लिए हमारी तैयारी तब पूरी नहीं थी। फलस्वरुप चीन ने त्वांग पर कब्जा कर लिया। इस युद्ध में हमारी सेना के 2420 अधिकारी और जवान कामेंग सेक्टर पर वीरगति को प्राप्त हुए जिनका स्मारक स्थल त्वांग में स्थापित है।

‘‘तवांग फाल‘‘ के बाद भारतीय सेना पीछे हटी और चीनी सेना को रोकने के लिए नये बंदोबस्त किये गए। इस रणनीति के तहत सेना को तवांग चू नदी पर रोकने और 13 हजार 7 सौ फुट पर स्थित सेला पास को किसी भी सूरत में पार न होने देने के लिए 4 -गढ़वाल राइफल को तैनात किया गया था।

4- गढ़वाल एकदम नई फौज थी। अपने गठित होने के मात्र 2 साल 11 माह  की अवधि में इसने चीनी सेना से जमकर लोहा लिया और उसे सेलापास लांघने में लोहे के चने चबाने पड़े।

17 नवंबर 1962 की सुबह पांच बजे जंग गांव तैनाती स्थल पर चीनी आक्रमण शुरु हो गया। सुबह 07. 45 बजे व 09.10 बजे के आक्रमण की लहरों पर भी फौज अडिग डटी रही लेकिन चौथी बार चीनी सैनिकों ने अपनी एमएमजी गन को एक टीले पर जमाकर भारतीय फौज पर अंधाधुंध गोलियों की बरसात शुरु कर दी।

गढ़वाल राइफल के जवान इस मशीनगन की ज़द पर आ रहे थे। जसवन्त सिंह रावत की तैनाती जंग से 5 किमी ऊपर थी और दुश्मन निरंतर आगे बढ़ने के लिए टोह ले रहा था। लेकिन 4- गढ़वाल की मुस्तैदी उसे हर बार शिकस्त दे रही थी।

तब लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी, राइफल मैन जसवंत सिंह रावत और गोपाल सिंह गुसाईं ने स्वेच्छा से इस मिशन के लिए हामी भरी।

गोलियों की बौछारों के बीच चीनी मशीनगन को शांत करने के लिए तीनों गढ़वाली वीर अपनी जान पर खेलने के लिए तैयार हो गए। निडर जसवंत सिंह ने हथगोले से दुश्मन पर हमला कर दिया।

घायल दुश्मन से मशीनगन छीन ली और अपने बंकर की ओर लौट आए, लेकिन कवर फायर दे रहे त्रिलोक सिंह नेगी दुश्मन की गोलियों का निशाना बनकर शहीद हो गए और गोपाल सिंह गुसाईं घायल हुए।

कहते हैं —जंग के इस युद्ध में जसवंत सिंह ने अलग-अलग हथियारों से निरंतर फायर करते रहे। इस तरह चीनी सेना को 72 घंटे तक दुविधा में रोके रखा। 21 साल 2 माह 28 दिन की आयु में ही देवभूमि के महावीर जसवंत सिंह शहीद हो गए।

इस असाध्य शौर्य के लिए 21 साल के राइफल मैन जसवंत सिंह रावत को मरणोपरान्त महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।  लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी को मरणोपरान्त वीर चक्र और घायल राइफलमैन गोपाल सिंह गुसाईं को वीर चक्र का सम्मान मिला।
मरणोपरान्त भी जसवंत सिंह रावत को निरंतर प्रमोशन देकर आनरेरी कैप्टन के पद से रिटायर किया गया है।

नूरानांग क्षेत्र में महावीर चक्र विजेता के लिए भव्य ‘‘जसवंत गढ़‘‘ शहीद स्मारक बनाया गया है। जहां सभी रैंक के अधिकारी और सैनिक जसवंत गढ़ स्मारक पर रुककर महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

– भूपत सिंह बिष्ट

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