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पहाड़ बसाने की कवायद में खटता पूर्व फौजी आलम सिंह पँवार !

पौड़ी गढ़वाल के गांवों से पलायन रोकने के लिए पलायन आयोग भी असफल।

पहाड़ बसाने की कवायद में खटता पूर्व फौजी आलम सिंह पँवार !
पौड़ी गढ़वाल के गांवों से पलायन रोकने के लिए पलायन आयोग भी असफल।

यह व्यथा – कथा 74 वर्षीय रिटायर फौजी आलम सिंह पँवार की नहीं,

अपितु गढ़वाल के सभी गांवों में पसर चुकी है।

 


सरकार चाहती है – सीमांत प्रदेश उत्तराखंड के गांव आबाद और हरियाली से

भरपूर साबित रहें।
पलायन आयोग की सिफारिशें रिटायर फौजी आलम सिंह पँवार को

रास नहीं आती।
पहाड़ के गांव फसल बचाने के लिए बंदर और सूअर से भिड़ते हैं।

खेत के लिए बीज, खाद और पानी की व्यवस्था देवता मनाने जैसा कठिन है।

ऐसे में बाघ – बघेरे का आतंक गांवों की बची -खुची जिंदगियों को तोड़ रहा है।
तेंदुए को भगाने के लिए शोर मचाते ग्रामीण, मकानों में घुसपैठ करता

आदमखोर, छोटे बच्चों और महिलाओं को अपना निवाला बनाता आदमखोर

एक बुरे सपने की तरह निरंतर घटित हो रहा है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि बाघ प्राय दिन में सोते और रात्रि में शिकार पर निकलते हैं।

अब तो बाघ प्रजाति के बघेरे, गुलदार या तेंदुए दिन दहाड़े खौफ फैलाते घूम रहे हैं।

रिटायर फौजी आलम सिंह पँवार की दुधारू गाय पौड़ी जनपद, एकेश्वर ब्लाक के

जैंतोली तल्ला गांव में मार दी। बछड़ा अब माँ के वियोग में तड़प रहा है और

वृद्ध आलम सिंह अपनी किस्मत को दोष देते हैं।

पहाड़ के गांवों में आदमखोर जानवरों के साथ जीवन बिताना निसंदेह

अच्छे दिन नहीं हो सकते हैं।

वन विभाग चाहता है – जंगलों में आग लगे तो ग्रामीण कंधे से कंधा

मिलाकर उनका साथ  देकर आग बुझायें।
ग्रामीणों के पशुधन जंगली जानवर मार डालें तो एक लंबी कवायद

अंग्रेजी शासनकाल की चली आ रही है।
भले ही आज युवा सांसद तीरथ सिंह रावत, वरिष्ठ नेता सतपाल महाराज

और दिलीप सिंह रावत जैसे समझदार नेता गढ़वाल का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

गढ़वाल के दुर्गम गांवों में चुनौती शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य, रोजगार के साथ

आदमखोर से परिवार और पशुधन बचाने की भी है।


ऐसे में बाप – दादा के गांव से पलायन आसान समाधान नज़र आता है।

पंचायत राज की लचर प्रशासनिक क्षमता के चलते पौड़ी जनपद में

नगरीय और ग्रामीण नागरिकों की सुविधा में ज़मीन और आसमान सा

अंतर खड़ा होने लगा है।
सरकार को शहर से फोकस हटाकर गांवों को आबाद रखने की योजनायें

बढ़ानी जरूरी हैं। तभी गांव और महिलाओं का सशक्तिकरण हो सकता है।

पहाड़ में विकासखंड अधिकारी और जिला विकास अधिकारी को अपनी

महता साबित करनी है। डीएफओ – डिविजनल फोरेस्ट आफिसर अपना बंगला

शहर में बनाने का मोह छोड़कर जंगलों में रहेंगे तो वन्य प्राणी, जंगल के साथ

ग्रामीण भी राहतभरी ज़िंदगी गुजार पायेंगे।

74 वर्षीय रिटायर फौजी आलम सिंह पँवार ने अपनी ज़िंदगी पौड़ी गढ़वाल को

न्यौछावर की हुई है – सरकार उन्हें राहत दे और फौजी के ज़ज्बे को सराहे,

कैसे पहाड़ में गांव आबाद रखे जाते हैं।
– भूपत सिंह बिष्ट।

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