सनातन संस्कृति: भारतीय संस्कृति में बारह कुंभ की परिकल्पना और काशी में कुंभ !
हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक के अलावा बनारस, वृंदावन, कुंभकोणम, रजि़म कुंभ और तिब्बत में भी कुंभ जैसे मेले आयोजित करने की परम्परा

सनातन संस्कृति: भारतीय संस्कृति में बारह कुंभ की परिकल्पना और काशी में कुंभ !
चार प्रमुख कुंभ स्थलों के बाद देश की पवित्र नदियों में अमृत और कुंभ जैसे पवित्र आयोजन स्थलों की जानकारी गूगल ने संरक्षित की है
कोरोना वैश्विक आपदा के बीच पिछले साल हरिद्वार कुंभ महापर्व के शाही स्नान वैशाखी पर्व – 14 अप्रैल और चैत्र पूर्णिमा – 27 अप्रैल में दिव्य और भव्य अलौकित दृश्यों के साथ सुखद और सफल संपन्न हुए ।
उत्तराखंड सरकार ने विश्वभर में सीधे प्रसारण के लिए प्रसार भारती के दूरदर्शन उत्तराखंड की सेवायें मुहैया करायी और सनातन संस्कृति से जुड़ा यह पर्व कालजयी हुआ ।
तेरह अखाड़ों से जुड़े हजारों साधु – नागा सन्यासियों और लाखों भक्तों की पावन गंगा में आस्था की डुबकी और उल्लास के पल अपूर्व रहे ।
देश विदेश में लाखों लाख दर्शकों ने दूरदर्शन के पर्दे पर सनातन संस्कृति के कुंभ आस्था पर्व और गंगा मैया के प्रति अपार श्रद्धा के भाव विभोर दर्शन किए।
कुंभ महापर्व पर गंगा स्नान कर अमृत पान करने की कथा को साधु संयासियों ने मार्मिक ढंग से समझाया – अमृत ग्रहण करने का अर्थ जीवन में सांसारिक मोह माया का त्याग करना है।
इस अवसर पर मानवता के गुणों को अंगीकार हम असुरों जैसी दिनचर्या से बाहर आ सकते हैं। आस्था और समर्पण से जीवन में निश्चय ही विजयश्री मिलती है।
किन्नर अखाड़े की प्रमुख लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, अपने सैकड़ों अनुयायी और ठाठ बाट के साथ शाही स्नान में शामिल हुई। भगवान शिव के गिरिजा शंकर – अर्द्ध नारीश्वर रूप का परिचय, इस शाही स्नान में किन्नर अखाड़े के संतों ने कराया है।
वैसे हर अखाड़े के साथ महिला अनुयायी भी बड़ी संख्या में हर की पैड़ी पर स्नान के लिए अपने गुरूजनों के साथ – साथ चल रहे थे।
अधिकांश संत इस बार भारत और पूरे विश्व के मानव समाज को कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करते सुने गए।
कुंभ महापर्व से जुड़ी कहानियों को सुनाते संस्कृति के विद्वान ने बताया – हरिद्वार , इलाहाबाद, नासिक और उज्जैन में (गंगा, प्रयागराज इलाहबाद में गंगा, यमुना और सरस्वती, नासिक में गोदावरी और उज्जैन -शिप्रा नदी में ) सनातन कुंभ मेले का आयोजन तो हो ही रहा है।
साथ में राशियों के सक्रांति काल में देश के विभिन्न 12 स्थानों पर कुंभ मेला आयोजित करने की परम्परा भी चली आ रही है। इस में अनेक स्थानों पर भगवान शिव की स्तुति और कुछ वैष्णव मत आस्था से जुड़े हैं।
उदघोषक ने बताया कि राशि फल के अनुसार रामेश्वरम, सिमरिया तुलार्क, कुरूक्षेत्र, गंगासागर, कलकत्ता, कुंभकोणम तमिलनाडु, ब्रह्मपुत्र असम, श्री बदरीनाथ धाम और जगन्नाथ धाम जैसे धार्मिक स्थलों में कुंभ आयोजन की प्राचीन मान्यता है।
गूगल में सर्च करने पर मालूम हुआ कि त्रिम्बकेश्वर बारह ज्योर्तिलिंगों में एक है और नासिक से तीस किमी दूर गोदावरी के तट पर है। नासिक को दक्षिण काशी भी कहते हैं और यहां बनवास काल में भगवान राम ने अज्ञात वास किया है।
उज्जैन को महाकालेश्वर नगरी या प्राचीन काल में अवंतिका या अवंतिकापुरी कहा गया है। शिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन को सनातन सात मोक्षपुरी अयोध्या, मथुरा, काशी – वाराणसी, कांचीपुरम और द्वारका के साथ पुण्य सप्तपुरी में गिना जाता है।
इसी प्रकार हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक के अलावा बनारस, वृंदावन, कुंभकोणम, रजि़म कुंभ और तिब्बत में भी कुंभ जैसे मेले आयोजित करने की परम्परा चली आ रही है। और सभी स्थानों पर आयोजन की तिथियां राशिफल के अनुसार वृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा की स्थिति देखकर अग्रिम तय कर ली जाती हैं।
तमिलनाडु के कुंभकोणम में प्रत्येक बारह साल बाद 20 एकड़ के विशाल में कुंड में हिंदु आस्था से जुड़े कुंभ मेले का आयोजन कर रहे हैं।
शिव भक्त तमिल हिंदुओं की मान्यता है कि भारत की गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्र, कावेरी और सरयू इन नौ पवित्र नदियों का संगम इस कुंड में होता है।
प्रत्येक 12 साल बाद होने वाले इस आयोजन में दक्षिण भारत से कुंभ जैसी भव्यता और दिव्यता जुटती है।
रंजिम कुंभ का आयोजन हर साल छतीसगढ़ राज्य के गरियाबंद जनपद में आयोजित होता है।
महानदी, पैरी और सोंदुर नदियों के संगम पर राजीव लोचन मंदिर के समीप इस मेले को पांचवे कुंभ की संज्ञा दी जाती है। रंजिम कुंभ में वैष्णव और शैव अनुयायी प्रयागराज की तरह यहां कल्पवास कर पुण्य अर्जित करते हैं।
बारह साल बाद आयोजित की जाने वाली ” नंदा राजजात यात्रा ” भी गढ़वाल हिमालय में कुँभ मेला माना जाता है।
चार प्रमुख कुंभ स्थलों के बाद देश की पवित्र नदियों में अमृत और कुंभ जैसे पवित्र आयोजन स्थलों की जानकारी गूगल में संरक्षित है और इन संदर्भो का उपयोग समय और स्थान की नज़ाकत समझ कर करना बहुत आवश्यक है।
धार्मिक आयोजन हमेशा पोंगा पंडित नहीं बनाते, बल्कि समय और परिस्थितियों के अनुरूप आस्था, समर्पण और मेधा मानवता के लिए कल्याणकारी होती है।
देश विदेश से जुटे इस समागम कुंभ में समरस्ता और संवेदना के मूल्यों में निश्चित ही श्रीवृद्धि होती है।
– भूपत सिंह बिष्ट।