एक अनार सौ बीमार : दायित्वों का आवंटन कितनों की मुराद होगी पूरी?
धामी सरकार में लाल बत्ती दर्जा धारियों की लाटरी पाने के लिए बेचैन जुगाड़वाले कार्यकर्ता।

एक अनार सौ बीमार : दायित्वों का आवंटन कितनों की मुराद होगी पूरी?
धामी सरकार में लाल बत्ती दर्जा धारियों की लाटरी पाने के लिए बेचैन जुगाड़वाले कार्यकर्ता।
( दिनेश शास्त्री वरिष्ठ पत्रकार )
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने अगले कुछ दिनों में
पार्टी नेताओं को दायित्व दिए जाने का बयान दिया है।
ऐसे में सरकारी सुख भोगने की लालसा वाले नेताओं की धुकधुकी और बढ़ गई है।

विश्व की सबसे बड़ी पार्टी और दूसरी बार लगातार प्रदेश सत्ता पर
काबिज होने के चलते नेताओं की आशाएं और अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं।
वरना अब तक प्रदेश का चुनाव हारने की स्थिति में पार्टी का एक वर्ग दूसरे
पाले का रुख कर जाता है।
उत्तराखंड की जनता जैसे हर पांच साल में बदलाव करती रही लेकिन
2022 – चुनाव में विधानसभा इतिहास की परिपाटी बदलते हुए जनता ने
भाजपा का ही पुन: राजतिलक कर डाला।
अब दायित्व की अपेक्षा रखनेवालों की संख्या और बढ़ गई है। लगभग डेढ़ साल का
अरसा बीत चुका है। हर माह मुराद पूरी न होने पर अंदरखाने दबाव की
राजनीति – जुगाड़बाजी शुरू है।
कुछ लोगों को पार्टी संगठन में खपा दिया गया है लेकिन इसके बाद भी पार्टी कार्यकर्ताओं की
बड़ी जमात अभी भी सत्ता द्वार पर टकटकी लगाए हुए है।
पिछले साल मार्च में सीएम पुष्कर सिंह धामी के दोबारा सत्तारोहण के
बाद से दर्जनों बार चर्चा गर्म रही कि जल्द ही लालबत्ती वाले दायित्व बंटने वाले हैं
लेकिन हर बार नतीजा ढाक के तीन पात सिद्ध होता रहा।
अब जबकि निकाय चुनाव सिर पर आने वाले हैं और लोकसभा चुनाव भी
ज्यादा दूर नहीं तो पार्टी को एकजुट रखने का तात्कालिक उपाय दायित्व
आवंटन ही बचता है।
क्षत्रपों को साधे रखने के लिए दर्जाधारी पद राजनीति के आकर्षण हैं।

प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने गेंद धीरे से सीएम धामी के पाले में सरकाते हुए
कह दिया – उनकी इस संबंध में सीएम से बात हो गई है और सीएम के प्रवास से
लौटते ही दायित्व वितरण हो जायेगा।
सीएम धामी का आगामी 25 सितम्बर से विदेश प्रवास का कार्यक्रम है।
जाहिर है उससे पहले भाजपा के कुछ लोगों को दायित्व देने की घोषणा हो सकती है।
समझ लीजिए अगर अब दायित्व नहीं बंटे तो मामला फिर लम्बा लटक सकता है।
सरकार के लिए अगले दो तीन माह बेहद महत्वपूर्ण हैं।
दिसम्बर में प्रदेश में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का कार्यक्रम है।
धामी सरकार का पूरा फोकस इसी पर है।
कोशिश पूरी है कि 2018 की तुलना में इस बार का आयोजन भव्य ही नहीं
बल्कि सार्थक भी हो। यह अलग बात है कि आयोजन से जुड़े अधिकारी
वही हैं जो तब भी थे, आज भी हैं।
ऐसे में कितना निवेश राज्य में आएगा, यह भविष्य के गर्भ में है।

बहरहाल यहां चर्चा भाजपा में दायित्व वितरण की है। स्थिति यह है
सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते दायित्व के दावेदारों की संख्या भी ज्यादा है।
या यों कहें पार्टी में एक अनार सौ बीमार की स्थिति है। ठीक वही हाल है
जैसे किसी एक सरकारी पद के लिए हजार आवेदक आते हैं,
उसी तरह की स्थिति भाजपा में भी है।
महेंद्र भट्ट ने इशारा किया है कि अभी सरकार में करीब 70 दायित्व रिक्त हैं
लेकिन आवेदक गिनने लगेंगे तो यह संख्या नगण्य ही है।
सबका साथ सबका विकास का नारा तो ठीक है लेकिन सबको संतुष्ट कर
पाना आसान नहीं होगा।
जाहिर है सीमित रिक्तियों की तुलना में असंख्य आवेदकों को छांटना
मेंढक तोलने जैसा ही है। जिसकी मुराद पूरी न हो , उसे साथ जोड़े रखना
पार्टी के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकती है।
भाजपा बेशक कहे कि वह बेहद अनुशासित और संस्कारित पार्टी है।
नेता पार्टी विद डिफरेंस की बात भी करते हैं लेकिन सच तो यही है कि वर्षों से
पार्टी की सेवा कर रहे लोग प्रतिफल की प्रत्याशा में हैं।

पिछली सरकार में और अधिक न मिल पाने के कारण कुछ लोग पार्टी को
गुड बॉय कर गए थे। अब तो समय का सिद्धांत है – पार्टी से जुड़ने का मिलेगा क्या?
यही नहीं इससे एक कदम आगे की बात यह होने लगी है कि मैं आपके पास
आऊंगा तो आप क्या दोगे, और आप मेरे पास आओगे तो क्या लेकर आओगे।
इसे युगधर्म कहो या शिष्टाचार – राजनीति सेवा कम और व्यापार
ज्यादा सिद्ध हुई है। भाजपा इस बुराई से कितना बच सकती है?
चुनाव की घोषणा के साथ साफ होगा।
— दिनेश शास्त्री सेमवाल।