उत्तराखंड सांस्कृतिक परम्परा – माँ राजराजेश्वरी व बाणासुर दिवारा यात्रा !
द्वापर युग के महाप्रतापी परम शिव भक्त राजा बाणासुर और देवभूमि की अधिष्ठात्री देवी राजराजेश्वरी की पूजा संपन्न।

उत्तराखंड सांस्कृतिक परम्परा – माँ राजराजेश्वरी व बाणासुर दिवारा यात्रा !
द्वापर युग के महाप्रतापी परम शिव भक्त राजा बाणासुर और देवभूमि की अधिष्ठात्री देवी राजराजेश्वरी की पूजा संपन्न।
केदारखंड में आयोजित सांस्कृतिक दिवारा यात्रा विधि विधान से हवन पूजा के बाद
आज संपन्न हुई।
लोक मान्यता है – द्वापर युग में हिमालय के महाप्रतापी राजा और परम शिव भक्त बाणासुर
और देवभूमि की अधिष्ठात्री देवी आदि शक्ति राजराजेश्वरी की पूजा – अर्चना के लिए
दिवारा यात्रा आयोजित की जाती है।
स्व. अमरनाथ पोस्ती द्वारा स्थापित मनकामनेश्वर मंदिर लमगौंडी (बामसू) में हवन पूजन
और भंडारे के साथ यात्रा पूर्ण हो गई।
करीब ढाई दशक के अंतराल के बाद इस साल एक पखवाड़ा पूर्व यह यात्रा
शुरू हुई थी। बदरी – केदार, गुप्तकाशी, त्रियुगीनारायण, कालीमठ, ऊखीमठ तथा
अन्य तीर्थों के भ्रमण के बाद बुधवार को जन्माष्टमी पर्व पर दिवारा यात्रा के समापन
पर पूरा वातावरण भक्तिपूर्ण रहा।
अपने आराध्य देव बाणासुर और भगवती राजराजेश्वरी की इस दिवारा यात्रा में सभी भक्तजन
पीत वर्ण के विशिष्ट वेशभूषा, नंगे पांव, पैदल भीषण शीत में बदरी- केदार धामों में डोली लेकर गए।
इस दुर्गम यात्रा में उनके हौसले कहीं पर भी पस्त नहीं हुए और ना ही पूरी यात्रा के दौरान
किसी भी भक्त की सेहत प्रभावित हुई।
पूरे अनुष्ठानिक ढंग से आयोजित इस यात्रा के साक्षी बदरी – केदार तीर्थों में देश के
विभिन्न भागों से आए श्रद्धालु भी रहे।

सभी मंदिरों में श्री बदरीनाथ – केदारनाथ मंदिर समिति ने दिवारा यात्रा का
भरपूर स्वागत किया। स्थान – स्थान पर जनसामान्य और विशिष्ट लोगों ने यात्रा का पुष्प वर्षा,
अक्षत, धूप दीप और अर्घ्य लगा कर स्वागत किया।
अपनी संस्कृति के रक्षण, संवर्द्धन और परिमार्जन में लमगौंडी वासियों का
कोई सानी नहीं है।
बाणासुर तथा राजराजेश्वरी दिवारा यात्रा समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र प्रकाश शुक्ला (मेरठवाल)
तथा पदाधिकारियों ने इस आयोजन को सफल बनाया तथा व्यवस्था की दृष्टि से
यात्रा एक नजीर बन गई है।
भगवान शिव का इस सम्पूर्ण क्षेत्र पर सदैव आशीर्वाद रहा है। माना जाता है कि दिवारा यात्रा से
देव शक्तियां जागृत होती हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो यह सनातन का अभ्युदय है जिसका ध्येय सर्वे भवन्तु सुखिन: है।
इस दृष्टि से क्षेत्रवासी हमेशा नवीन ऊर्जा से ओतप्रोत होते हैं।
इस बार की दिवारा यात्रा में न्यूनतम तीन पीढियां जुटी हैं और धियानियों ने बड़चढ़ कर
इस उत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी, वह अपने आपमें अद्भुत है।
एक छोटे से गांव में हजारों लोगों ने इस आयोजन में भाग लिया। कई वर्षों से मायके न
आ पाने वाली धियानियां भी इस बहाने एकत्र हुई।
इस भूमि के आराध्य देव बाणासुर तथा भगवती राजराजेश्वरी ने कई लोगों को
मिलने का अवसर दिया।
लोक कथाओं में महाप्रतापी राजा बाणासुर अपने कालखंड में देवाधिदेव भगवान शिव की
कृपा से हिमाचल प्रदेश के मणिमहेश से नेपाल के डोटी तक सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र के
शासक रहे हैं। भगवान शिव ने अपने परम भक्त बाणासुर की रक्षा के लिए
भगवान कृष्ण के विरुद्ध शस्त्र तक उठा लिए थे।
माना जाता है कि कैलाश गुरुकुल के स्नातक बाणासुर के बाद भगवान शिव को ऐसा कोई
अन्य प्रिय शिष्य नहीं मिला।
केदारघाटी में शैव मत का प्रमुख कारण बाणासुर ही है। इतिहासकार मानते हैं कि
हिमाचल प्रदेश के मणिमहेश से लेकर पिथौरागढ़ में सौर गढ़ तक बाणासुर के अनेक किले थे।
इनमें से ही एक लमगौंडी जिसका पूर्व नाम बामसू वर्णित किया गया है – स्कंद पुराण में
शोणितपुर नाम से उल्लेखित है।
ज्ञातव्य है कि ऊखीमठ में दानवीर राजा बलि के पुत्र बाणासुर की कन्या ऊषा का महल था।
उसे गुप्तकाशी के मंदिर में माता पार्वती ने ललित कलाओं, नृत्य, गीत संगीत की शिक्षा दी थी।

एक पौराणिक प्रसंग इस तरह है कि भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को उषा की सहेली चित्रलेखा
ऊखीमठ ले आती है।
बाणासुर को जब इसका पता चलता है तो अनिरुद्ध को शोणितपुर में कैद कर दिया जाता है।
उसको मुक्त करने के लिए ही पहले भगवान कृष्ण के पुत्र प्रह्लाद और बाद में खुद द्वारिका से
कृष्ण युद्ध भूमि में उतरते हैं।
फिर तो बाणासुर की रक्षा के लिए भगवान आशुतोष स्वयं शस्त्र उठा लेते हैं।
अन्ततः ऊषा और अनिरुद्ध का ऊखीमठ के राजमहल में ही विवाह हो
जाता है, वह विवाह वेदिका आज भी विद्यमान है।
— प्रस्तुति दिनेश शास्त्री सेमवाल