
इलेक्टोरल बांड मुकदमे की सात साल बाद सुप्रीम कोर्ट में सुनवायी शुरू !
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण ने दलील दी – इलेक्टोरल बांड चुनाव और लोकतंत्र को प्रभावित कर रहे हैं।
सात साल बाद अब सुप्रीम कोर्ट में इलेक्टोरल बांड की वैधता पर सुनवायी शुरू हुई।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरथ ने सरकार से सवाल किए – क्या इलेक्टोरल बांड पारदर्शी हैं और चुनाव फंडिंग में धन का स्त्रोत जाहिर होता है ?
इलेक्टोरल बांड से चुनाव में चंदा लेने से निष्पक्ष चुनाव और आर्टिकल 324 का उल्लंघन हो रहा है – ये तर्क सरकार के खिलाफ वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में रखे हैं।
सरकार की ओर से सोलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने इलेक्टोरल बांड को पारदर्शी बताया तथा कालेधन का इस्तेमाल होने की संभावना को असंभव बताया।
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अपनी जिरह में कहा – चुनाव से ठीक पहले इलेक्टोरल बांड पार्टी विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए जारी होते हैं।
इस की संवैधानिक वैधता के साथ – साथ इन बांडस से चंदा उगाहने वाले दलों को आरटीआई के दायरे में लाना जरूरी है ताकि आम नागरिकों को पता चल सके करोड़ों रूपये का चंदा कौन किस पार्टी को दे रहा है।
चुनावी चंदा लेने के सरकार ने पिछली तिथि से विदेशी कंपनियों से प्राप्त विदेशी धन के कानून में परिवर्तन किया है।
चुनाव में देशी – विदेशी चंदा लेने के कानून को राज्यसभा में मनीबिल के रूप में लाकर पास कराया गया ताकि इस पर बहस और मतदान की अनिवार्यता न रहे।
अत: इलेक्टोरल बांड की सुनवायी संवैधानिक बैंच में की जाए। जस्टिस गंवई ने मामले की अगली तारीख 6 दिसंबर तय की है।
पदचिह्न टाइम्स।