उत्तराखंड का इगास बग्वाल पर्व !
एकादशी, देवउठनी एकादशी, ग्यारस इगास, देवोत्थान एकादशी, बूढ़ी दीवाली यानि विष्णु भगवान का जागृत होना।

उत्तराखंड का इगास बग्वाल पर्व !
एकादशी, देवउठनी एकादशी, ग्यारस इगास, देवोत्थान एकादशी, बूढ़ी दीवाली यानि विष्णु भगवान का जागृत होना।
प्रस्तुति – सुमित्रा चौहान
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी, देवउठनी एकादशी, ग्यारस इगास, देवोत्थान एकादशी, बूढ़ी दीवाली – यह सारे पर्व आज ही हैं। चार माह – चातुर्मास की नींद के बाद विष्णु भगवान जागने वाले हैं और फिर से सृष्टि का कार्यभार संभालेंगे।

याद रहे वो हमारी तरह सामान्य नींद से नहीं, अपितु योगनिंद्रा से जागेंगे। भारतीय मानस की अद्भुत कल्पना देखिए – यहां तीन प्रमुख देवताओं में से एक ब्रह्मा जी का आवास अंतरिक्ष में, विष्णु भगवान का आवास समुद्र में और भोले भंडारी शिव हिमालय में वास करते हैं।
तीनों देवों के बीच सृष्टि के कार्यभार का बंटवारा है और कोई सत्ता की चुनौती नहीं है। चातुर्मास में सत्ता भगवान शिव के हाथों में रहती है और विष्णु भगवान योगनिंद्रा में चले जाते हैं।
अब विष्णु भगवान जागे हैं तो भगवान शिव ध्यानस्थ हो जायेंगे क्योंकि अब हिमालयी में ठंड का प्रकोप बढ़ने वाला है।
यह भी सुखद रहस्य है कि चातुर्मास मे जब समुद्र मे जलप्रलय की स्थिति बनती है तो विष्णु भगवान योग निंद्रा में होते हैं। जीवन में समभाव उन्हें विण्णु बनाता है – हर परिस्थिति में मुस्कराहट बनी रहती है।
हिमालय की साराी पर्वत श्रंखलायें जब बर्फ से पट जाती हैं – तब रूद्र शिव ध्यान में चले जाते हैं और बाह्य परिस्थितियां उन्हें बिलकुल प्रभावित नहीं कर पाती हैं।
ब्रह्मा जी का कार्यक्षेत्र बसंत ऋतु मे शुरू होता है – तब उन्हें सृष्टि की नव रचना करनी होती है।
इन त्रिदेवों की सृजन – जीवनी शक्ति देवी है, जिन के सत्व से तीनों देव शक्ति ग्रहण करते हैं और पृथ्वी का संचालन करते हैं सो हर देव का कार्यकाल चार माह तय है।
सृष्टि के चक्र के साथ समय और सत्ता का संचालन बदलता रहता है। सनद रहे जिस में शिव की साधना, ब्रह्मा सी दृष्टि और विष्णु सा समभाव हो – वही शक्ति को, देवी को मातृत्व को और आत्म तत्व को उपलब्ध हो सकते हैं।
भारतीय मानस की यह अवधारणा हमें पूर्ण दृष्टि प्रदाना करती है। बहरहाल आज विष्णु भगवान ने सृष्टि संचालन का कार्यभार पुनः संभाल लिया है सो उन्हें बेहतर कार्यकाल के लिए बधाई और सब जीवधारियों को नवजीवन की शुभकामनांए !
सो आज के दिन उत्सव तो बनता है – इसलिए एकादशी को दिवाली, इगास बग्वाल या बूढ़ी दिवाली की तरह मनायें। बस ध्यान रहे कि मूल भाव यानि मातृत्व को उपलब्ध होना ही मनुष्यता है।
– गोपाल, पिथौरागढ।