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 पहाड़ के विधायकों को अब चुप्पी छोड़नी होगी  – लखपत बुटोला !

पहाड़ में  विधानसभा क्षेत्रफल मैदान  से कहीं ज्यादा लेकिन विकास और बजट में घोर उपेक्षित।

 पहाड़ के विधायकों को चुप्पी छोड़नी होगी  – लखपत बुटोला !
पहाड़ में  विधानसभा क्षेत्रफल मैदान  से कहीं ज्यादा लेकिन विकास और बजट में घोर उपेक्षित।

उत्तरांचल प्रेस क्लब के सभागार में बदरीनाथ विधायक लखपत बुटोला का आक्रोश फिर

छलका  – विधायक ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए पहाड़ी विधानसभाओं के विकास में

उपेक्षा व सौतेले व्यवहार का आरोप लगाया।

बजट सत्र में वित्तमंत्री प्रेम अग्रवाल के प्रति विरोध जताते हुए कांग्रेस विधायक लखपत बुटोला

बहिर्गमन कर गए थे।

उपचुनाव में पहली बार बीजेपी के दिग्गज प्रत्याशी पूर्वमंत्री राजेंद्र भंडारी को पराजित कर

लखपत बुटोला विधानसभा हेतु चुने गए हैं।

बुटोला ने कहा – हम पहाड़ी – मैदान में विभेद नहीं कर रहे। बदरीनाथ पूरे भारत का माथा

है लेकिन 4 हजार किमी क्षेत्रफल के लिए सरकार विकास योजनाओं में शिथिलता बरत रही है।

पहाड़ का जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र के विकास की बात न करे और विधानसभा में केवल

गाली और अपशब्द सुनने के लिए नहीं आते हैं।
देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और उधमसिंहनगर की तरह पहाड़ी जनपदों को विकास

और स्वरोजगार के अवसर मिलने चाहिए।
चार धाम यात्रा से देश – प्रदेश में आर्थिकी देने वाले क्षेत्र की घोर उपेक्षा हो रही है।

पहाड़ के युवा अपना स्वरोजगार ढेली – ढाबा, टैक्सी, होटल और गाइड का धंधा करने में

बेहाल हैं। पूरे देश को स्वच्छ जल और हरित पर्यावरण देने वाले पहाड़ के नागरिक

पहाड़ी राज्य में ठगा हुआ महसूस करते हैं।

मुझ पर सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाने वाले भूल रहे हैं कि पहाड़वासियों के लिए सदन में

मंत्री महोदय ने शुरूआत की है।

मेरे पिता 1962, 1965 और 1971 के भारत – चीन और पाकिस्तान के युद्ध सैनिक हैं।

कारगिल युद्ध में मेरे सगे भाई ने गोली खाई। हम अपनी आन, बान और शान से

समझौता करने जनप्रतिनिधि नहीं बने हैं।

अगर हमारे साथ भेदभाव होना है तो फिर उत्तर प्रदेश से अलग होने की क्या आवश्यकता

थी।विधानसभा में गढ़वाली, कुमायूंनी या जौनसारी बोलने की व्यवस्था नहीं है।

प्रदेश गीत अभी विधानसभा कार्रवाई में शामिल नहीं हो पाया है।

परिसीमन के नाम पर पहाड़ के विधायक लगातार कम हो रहे हैं और क्षेत्रफल मैदानी 

विधानसभाओं की तुलना में कई गुना बढ़ चुका है।

मैदानी विधानसभा और पहाड़ की विधानसभा का अंतर सरकार और

विधानसभा अध्यक्ष को समझना जरूरी है।
परिसीमन के खिलाफ आज , जो  पक्ष – विपक्ष के जनप्रतिनिधि मौन हैं,

उन्हें पहाड़वासियों  का अपयश झेलना पड़ेगा।
सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने  पहाड़ की पीड़ा उठा कर अपने स्वाभिमान

का परिचय दिया और मैं उनको धन्यवाद देता हूं।
पदचिह्न टाइम्स।

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