भारतीय सनातन धर्म में करूणा व अंहिसा, आज भी प्रासांगिक – दलाई लामा जी !
भले ही हम भारतीय भाई - बहिनों से दिखने में भिन्न हैं लेकिन हमारी अध्यात्मिक जड़े समान।

भारतीय सनातन धर्म में करूणा व अंहिसा, आज भी प्रासांगिक – दलाई लामा जी !
भले ही हम भारतीय भाई – बहिनों से दिखने में भिन्न हैं लेकिन हमारी अध्यात्मिक जड़े समान।
मुझे भारत में शरण लिए छह दशक से ज्यादा हो चुके हैं – सो मैं कह सकता हूं,
मैं भारत का सबसे पुराना निर्वासित अतिथि हूँ।
भारत माता ने मेरे तिब्बती हमवतनों को शरण दी। बच्चों को स्कूली शिक्षा दी,
बौद्ध भिक्षुओं को तिब्बत से निर्वासन के बाद धार्मिक शिक्षा जारी रखने के अवसर दिए हैं।
मैं 88 वर्ष पूरे कर चुका हूँ और मुझे कोई संशय नहीं है कि मेरी सोच,
शिक्षा व ज्ञान में प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का गहरा असर है।
सातवीं सदी में तिब्बत राजा सांगसेन गेंपो ने विद्वानों को देवनागरी लिपि में
तिब्बतन साहित्य लिखने को कहा।
आगे नालंदा विश्वविद्यालय से बुद्ध शिक्षा तिब्बत लिपि में अनुदित हुई।
भगवान बुद्ध के उदबोधन के 108 खंड तिब्बतन लिपि में लिखे गए।
220 खंड भारतीय बौद्ध विद्वानों के तिब्बतन लिपि में अनुदित हुए।
हमारी पहचान भले ही भारतीय भाई – बहनों से मेल नहीं खाती लेकिन हम सभी
एक सनातन संस्कृति को जी रहे हैं।
मैं छह वर्ष की आयु से इन किताबों को दिल से पढ़ता आ रहा हूँ।
मेरा दृढ़ विश्वास है कि तिब्बत की संस्कृति का आधार भगवान बुद्ध और नालंदा की परम्परा है।
ये हमारा सौभाग्य है – भगवान बुद्ध का साहित्य लुप्त होने पर फिर से
तिब्बत भाषा से संस्कृत और अन्य भाषाओं में अनुदित हुआ है।

भारत की गौरवशाली बौद्धिक सम्पदा आज भी विश्व के लिए प्रसांगिक हैं।
प्राचीन भारत में मन – मस्तिष्क और भावनाओं के अध्ययन की क्षमता
भारत और विश्व को विकास देने में सहायक है।
ऐसी बौद्धिक क्षमता किसी अन्य धर्म में नहीं है जो दुनिया भर में आज समाज को
समेकित विकास के लिए करूणा और अंहिसा का संदेश दे सकता है।
– दलाई लामा।
https://padchihnatimes.com/nobel-laureate-14-th-dalai-lama-turns-88/
(परम पूज्य 14 वें दलाई लामा के अंग्रेजी में प्रकाशित आलेख की अंश प्रस्तुति – भूपत सिंह बिष्ट)