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पुष्कर ने की बीजेपी की राह आसान, केशव मौर्य भी हार कर बने डिप्टी चीफ मिनिस्टर !

नई परिपाटी में जनता जनार्दन के फैसले को अस्वीकार कर - पार्टियां अब नेता नहीं प्रबंधक चुन रही हैं।

पुष्कर ने की बीजेपी की राह आसान, केशव मौर्य भी हार कर बने डिप्टी चीफ मिनिस्टर !

नई परिपाटी में जनता जनार्दन के फैसले को अस्वीकार कर – पार्टियां अब नेता नहीं प्रबंधक चुन रही हैं।

उत्तराखंड सरकार की भव्य ताजपोशी में केंद्र सरकार से लेकर विभिन्न प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री अपना कामकाज छोड़कर देहरादून पधारे।

इस राजतिलक में जैसे बीजेपी ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया – ऐसा कभी कांग्रेस चालीस – पचास साल पहले किया करती थी।

श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने में सभी नेता बड़े दीन – हीन और असहज नज़र आते थे।

उत्तराखंड विधानसभा में भी 70 विधायक जनता जनार्दन ने चुनकर भेजे लेकिन नेता सदन बाहर से मनोनीत हो गया।  उत्तराखंड में उच्च सदन नहीं है सो एक माननीय को मुख्यमंत्री के लिए इस्तीफा देकर जगह खाली करनी होगी।

यह परिपाटी नई नहीं है – जनरल खंडूडी के लिए कांग्रेस के टीपीएस रावत ने सीट खाली की थी।

कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए सितारगंज के विधायक ने इस्तीफा दिया और मुँह मांगी मुराद के साथ निगम के अध्यक्ष बनाये गए।
अब कुमायूं मंडल की यह सीट टिहरी के सांसद रह चुके विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा के पास है – जो नए मंत्रीमंडल में पुराने बीजेपी नेताओं को पछाड़कर मंत्री चुन लिए गए।

सांसद हरीश रावत के लिए मुख्यमंत्री मनोनीत होने पर धारचूला कांग्रेसी विधायक ने सीट खाली की और पहाड़ी प्रदेश पर बार – बार मुख्यमंत्री बदलने पर उपचुनाव का बोझ डाला गया।

NARAYAN DUTT TIWARI JI

लोकतंत्र में जनादेश बदलने का रास्ता कांग्रेस ने दिखाया है – स्वर्गीय नारायण दत तिवारी उत्तराखंड विरोध के लिए जाने गए हैं लेकिन उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री बनकर इतिहास भी बना गए।

तिवारी जी के लिए रामनगर विधायक ने इस्तीफा दिया और उत्तराखंड को पहला मुख्यमंत्री सदन के बाहर उपचुनाव में मिला।
इस बार बीजेपी ने हारे हुए विधायक को नेता सदन मनोनीत किया है – अब किसी जीते हुए विधायक को सीट छोड़नी है।

चुनाव आयोग के कायदे – कानून इतने कमजोर हैं कि खुलेआम यह दल बदल कराकर भी संभव हो सकता है।

एक बार फिर उत्तराखंड को उपचुनाव से मुख्यमंत्री नसीब होना है मानो जीते हुए विधायकों की क्षमता नेता सदन या मुख्यमंत्री बनने की नहीं है।

कुछ ऐसा ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हुआ है – जहां उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य विधानसभा चुनाव हार गए हैं।

फिर भी बीजेपी ने उन्हें उपमुख्यमंत्री की शपथ बड़ी धूमधाम भरे समारोह में दिला दी है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा हेतु जनता जनार्दन के निर्णय को बदलने के लिए – उच्च सदन – विधान परिषद है। फिलहाल  केशव मौर्य विधान परिषद के सदस्य हैं।
पिछली बार सांसद योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के पद पर विधान परिषद सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए हैं।

संविधान में विधायकों से इतर नेता सदन चुनना अपरिहार्य स्थिति में होना है ताकि गैर विधानसभा सदस्य अगले छह माह में किसी सदन का सदस्य बनकर आ जाए।

अब नेता सदन के लिए विधानसभा सीट का त्याग कर, उपचुनाव कराना लोकतंत्र में अनैतिक परिपाटी बनती जा रही है।
लोकतंत्र में जनता जनार्दन संवैधानिक वोट की ताकत से जनप्रतिनिधी चुनती है – अब पार्टी हाईकमान इस निर्णय को पार्टी हित में बदलते जा रहे हैं।

कांग्रेस ने चुनाव ना जीत पाने वाले नेताओं को कभी राज्य सभा व विधान परिषद के रास्ते मंत्री पद से नवाजा है और अब संविधान व्यवस्था को सभी पार्टियां अपने हित में तोड़ – मरोड़ रही हैं।

हमारा लोकतंत्र कमजोर है या नेतागण – यह बहस अब निरंतर जारी है।
– भूपत सिंह बिष्ट

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