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उत्तराखंड में भाजपा ने चखा हार का स्वाद लखपत से हुई कांग्रेस मालामाल !

बदरीनाथ से लखपत बुटोला 5224 और मंगलौर से काज़ी निजामुद्दीन ने 449 वोटों से जीते और कांग्रेस का परचम लहराया।

 

उत्तराखंड में भाजपा ने चखा हार का स्वाद लखपत से हुई कांग्रेस मालामाल !

बदरीनाथ से लखपत बुटोला 5224 और मंगलौर से काज़ी निजामुद्दीन ने 449 वोटों से जीते और कांग्रेस का परचम लहराया।

– दिनेश शास्त्री सेमवाल वरिष्ठ विश्लेष्क।

उत्तराखंड के प्रवेश द्वार मंगलौर और भारत के भाल नारायण के धाम बदरीनाथ दोनों जगह

भाजपा को हारकर मुंह की खानी पड़ी है। मंगलौर का दर्द तो भाजपा बर्दाश्त कर सकती

है कि राज्य गठन के बाद से वह कभी उस सीट को नहीं जीत पाई बल्कि अक्सर

तीसरे नंबर की खिलाड़ी रही।

भाजपा ये भी संतोष कर सकती है कि इस बार हार जीत का अंतर बेहद मामूली रहा।

मगर बदरीनाथ का घाव तो काफी गहरा लगा है। साख को ऐसी ढलान मिली है कि अब

दूर तक बचाव की संभावना कम है।
शर्मनाक यह रहा कि तीन माह पूर्व लोकसभा चुनाव में जहां भाजपा प्रत्याशी को

आठ हजार से अधिक मतों की बढ़त मिली, वहीं दलबदलू राजनीति के चतुर खिलाड़ी को

जनता जनार्दन ने ही पटखनी दे डाली।

सत्ताधारी दल की हनक के बावजूद वोटरों ने नकार दिया।

 


बूथ कमेटी, शक्ति केंद्र, विधार्थी, युवा, महिला और तमाम मोर्चों और विश्व की सबसे बड़ी

पार्टी का दावा करने वाली पार्टी अगर नारायण के दरबार से भी रुसवा हो गई हो तो

आने वाला कल कड़ी चुनौती भरा हो सकता है।

देवभूमि के प्रवेश द्वार मंगलौर पर एक हैवीवेट को आयात करने के बावजूद अगर

अनुकूल परिणाम न मिले तो चुनावी प्रबंधन को क्या कहा जाना चाहिए?

देश की बहुचर्चित बदरीनाथ विधानसभा सीट पर बुरी तरह पराजित होने वाली

पार्टी इसे दल बदल के लेबल का नतीजा नहीं कह सकती है।
उत्तराखंड राजनीति में फिलहाल दलबदल से सत्ता में बैठे आधे लोग तो

उसी गोत्र से लिए गए हैं। वैसे भी अब सुचिता सिद्धांतों का दावा करने वाली

पार्टी का तो कोंग्रेसीकरण साफ दिखता है।

 

विधानसभा उपचुनाव में बदरीनाथ की जनता ने दलबदल कर चुनाव थोपने और

अपनी स्वार्थी राजनीति चमकाने की प्रवृत्ति को ठेंगा दिखा दिया।

हिमाचल प्रदेश के बाद अब उत्तराखंड में बदरीनाथ की जनता के जनादेश

से दलबदुलओं के आगे बुरे दिन शुरू हो गए हैं।
स्पष्ट है – पांच साल का निर्वाचित जन प्रतिनिधि पार्टी को धोखा देकर

दोबारा जनता जनार्दन से बार – बार वोट मांगने न आए।
बदरीनाथ के पूर्व विधायक कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए – दरअसल उनका मंसूबा

मंत्री पद का होगा और शायद दलबदल करवाते इस तरह का कोई आश्वासन भी मिला हो।

आखिर पांच साल के लिए विधायक तो वे थे ही, मंत्री पद की लालसा ने उन्हें

इस तरह उलझाया कि माया मिली, न राम !
गढ़वाली में – ” तिमला भी खत्येन और नांगा भी दिख्येन।”

आज नरेंद्र सिंह नेगी का वह गीत सटीक गूंज रहा है ” तेरू मछोई गाड़ बौगीगे,

अब खा माच्छा”।

लोकसभा चुनाव में भाजपा को इस विधानसभा क्षेत्र में साढ़े आठ हजार वोटों की

बढ़त मिली, तब मोदी के नाम पर वोट मांगे गए थे किंतु इस बार निजी महत्वाकांक्षा

चुनाव पर भारी थी सो लोगों ने अपना मन बिना लाग लपेट खोल दिया, वे किसी व्यक्ति विशेष के

कैरियर को ढोने के लिए मजबूर नहीं है।

2022 विधानसभा चुनाव में राजेंद्र भंडारी को करीब 32 हजार वोट मिले थे किंतु

उपचुनाव में कांग्रेसी – भाजपायी का चोला लपेटकर तो नेताजी 22 हजार से थोड़ा

अधिक वोट तक सिमट चुके हैं।

लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी पांचों सीटें हारने के कारण

चित्त पड़ी कांग्रेस पार्टी को संजीवनी मिली है।

नव निर्वाचित गढ़वाल के भाजपा सांसद अनिल बलूनी और हरिद्वार सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत

के लिए उपचुनाव में हार का सामना भाजपा साख को चुनौती बना है।

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने लोकप्रियता और जनाधार

लखपत बुटोला की जीत से और मजबूत किया है।

उत्तरांखड विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस की जीत ने चुनाव आयोग

और वोटिंग मशीन की साख को मजबूती प्रदान की है।
अन्यथा हारने वाली पार्टी और नेता अक्सर बेचारी ईवीएम के मत्थे

दोष मढ़ते देखे गए हैं और मतपत्रों से वोट का बहाना ढूंडते हैं।
पदचिह्न टाइम्स।

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