अवार्ड के लिए काम नहीं करते, सरकार मान्यता दे तो अच्छा लगता है – नरेंद्र सिंह नेगी !
राष्ट्रीय संगीत अकादमी से पुरस्कृत लोकप्रिय गढ़वाली कवि और गायक नरेंद्र सिंह नेगी का संवाद।

अवार्ड के लिए काम नहीं करते, सरकार मान्यता दे तो अच्छा लगता है – नरेंद्र सिंह नेगी !
राष्ट्रीय संगीत अकादमी से पुरस्कृत लोकप्रिय गढ़वाली कवि और गायक नरेंद्र सिंह नेगी का संवाद।
उत्तरांचल प्रेस क्लब सभागार में उत्तराखंड के लोकप्रिय गढ़वाली गायक और गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने पत्रकारों से सीधा संवाद किया।
गढ़वाली कवि और गीतांग नरेंद्र सिंह नेगी पिछले पचास सालों से गढ़वाली और उत्तराखंड की अन्य बोली – भाषा को समृद्ध करते आ रहे हैं।
नरेंद्र सिंह नेगी को अभी तक पदम पुरस्कार से वंचित रखा गया है और इस का सीधा कारण उत्तराखंड की सरकारें नेगी जी के व्यंग्य गीतों की चपेट में रही हैं।
आलोचना बरदाश्त ना करने में कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकार समान भाव रखती हैं और नरेंद्र सिंह नेगी की तपस्या को स्वार्थी नेताओं ने हमेशा कमतर आंका है।
नेगी ने कहा – जीवन में अवार्ड मिलते रहते हैं। अवार्ड के लिए कोई काम भी नहीं करता है। फिर भी सरकार काम को मान्यता देती है तो अच्छा लगता है।
नरेंद्र सिंह नेगी ने पदम श्री से सम्मानित प्रीतम भरतवाण, माधुरी बड़थ्वाल और बसंती बिष्ट का उल्लेख किया। लोकभाषा में काम करने वालों कलाकारों को यश मिलना उत्तराखंड की उपलब्धि है।
गढ़वाली और आंचलिक भाषाओं में लेखकों के संघर्ष को रेखांकित करते हुए नेगी ने बताया – आज हिंदी पत्रकारिता भी पाठकों की कमी झेल रही है और गढ़वाली में लिखना बड़ा चुनौती भरा है।
उत्तराखंड सरकार को हिंदी, उर्दू और संस्कृत एकेडमी की तरह उत्तराखंड लोक भाषा एकेडमी पर अविलंब काम करना जरूरी है।
उत्तराखंड में हिमाचल की तर्ज पर भू कानून की आवश्यकता है। भू कानून में ढिलाई के कारण पहाड़ की भूमि माफियाओं के हाथों में जा रही है।
जमीन बचेगी तो संस्कृति बचेगी और हमारे लोकगीत बचेंगे।
नारायण दत तिवारी जी ने साहित्य कला परिषद तो बनायी लेकिन दबदबा अधिकारियों का रहा – ये अधिकारी सदस्यों के सुझाव अनदेखा करते रहे। मजबूरन दूसरी बैठक के बाद मुझे त्यागपत्र देकर बाहर आना पड़ा।
बीजेपी ने इस परिषद को ठंडे बस्ते में डाल दिया और परिषद का गठन ही नहीं किया।
हरीश रावत सरकार ने सौ से अधिक प्रविष्टियों में प्रदेश गीत का चयन किया।
अनुराधा निराला और मेरी आवाज – संगीत के साथ प्रदेश गीत की रचना हुई लेकिन फिर बीजेपी सरकार ने इस गीत को लाइब्रेरी में बंद कर दिया है।
हरीश रावत सरकार ने सुझाव तो काफी लिए लेकिन उन पर अमल नहीं किया।
यह उत्तराखंड की त्रासदी है कि जनता राज्य आंदोलनकारियों के साथ छल- बल करने वाले नेताओं को ही वोट से जीता रही है।
अपनी बोली और संस्कृति के लिए समाज को खुद सक्रिय होना है। सरकार और नुमायंदे ज्यादा कुछ नहीं करेंगे।
— भूपत सिंह बिष्ट