
उत्तराखंड राज्य ने पूरे किए 21 वर्ष, मुख्यमंत्री की बाढ़ !
अफसरशाही की तिकड़मों में विकास की बयार मंद।
-भूपत सिंह बिष्ट
9 नवंबर 2000 परेड ग्रांउड में नए राज्य की घोषणा करने भाजपा के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और जार्ज फर्नांडिस पधारे – तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों के सामने अपार भीड़ तब ठगी सी रह गई – जब पहले कार्यवाहक मुख्यमंत्री पद पर नित्यानंद स्वामी के नाम की घोषणा हुई।
शालीन नित्यानंद स्वामी तब उत्तरप्रदेश विधान परिषद के सभापति और अटल बिहारी वाजपेयी जी के करीबी होने के कारण इतिहास में नाम दर्ज करा पाए। दौड़ में सबसे आगे बने हुए भगत सिंह कोशियारी और रमेश पोखरियाल निशंक नाराजगी में पहले दौर में शपथ लेने नहीं पहुंचे।
उत्तराखंड राज्य को राजधानी नहीं मिली – गढ़वाल और कुमायूं का पेंच इतना बढ़ गया कि नैनीताल में हाईकोर्ट की घोषणा होने से समझ नहीं आया कि वादी इंसाफ मांगने कितना लंबा सफर तय करेंगे। सामान्यता हर राज्य में राजधानी और हाईकोर्ट एक साथ होते है लेकिन यहां पहले दिन राजधानी तय ना होने से आज तक सब बिखरा हुआ है।
गर्वनर, मुख्यमंत्री और उनका सचिवालय अघोषित राजधानी देहरादून में लेकिन लोकतंत्र का आधार भूत स्तंभ न्यायपालिका नैनीताल में, जहां राजकीय भवनों की कमी होने से जनपद के बड़े अधिकारी पचास किमी दूर हलद्वानी में अपना कार्यालय जमाये हुए हैं।
भगत सिंह कोशियारी की मुख्यमंत्री चाहत कुछ माह के लिए 2001 में पूरी हुई और स्वामी जी को पर्वतीय मूल का ना होने से कार्यवाहक सरकार से हटना पड़ा लेकिन आज 21 साल बाद उत्तराखंड राज्य में बिहारियों के छठ पर्व पर राजकीय अवकाश घोषित होने लगा है यानि नेता कमजोर और अफसरशाही हावी हो गई है।
राज्य की अवधारणा को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है – गैरसेण को जिला बनाये बिना, सीधे कमीश्नरी की घोषणा, सरकारी उपक्रम बदरी-केदार मंदिर समिति के बावजूद देवस्थानम बोर्ड, कुंभ मेले में आरटीपीसीआर का फर्जीवाड़ा, हरिद्वार – ऋषिकेश यात्रा के लिए टौल प्लाजा, रेत, बजरी खनन से क्षतिग्रस्त होते नदियों के पुल, शराब पर आश्रित राजस्व, अरबों रूपये निवेश प्रोपेगंडा और कोरोना काल में बुरी तरह से हांफ गया हेल्थ सिस्टम और हास्पीटल सारे मामले त्रिवेंद्र सरकार की चुनौती बने हैं।
गैरसेण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा और कांग्रेस के बागी मुख्यमंत्री पद के दावेदार नेताओं को चार साल तक बांधे रखना त्रिवेंद्र सिंह रावत की बड़ी उपलब्धि रहे हैं।
रमेश पोखरियाल निशंक भी मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे और यह पारी उन्हें रिटायर जनरल भुवन चंद्र खंडूडी के साथ शेयर करनी पड़ी लगभग ढाई साल तक एक दूसरे को हटाकर मुख्यमंत्री की राजनीति बीजेपी में परवान चढ़ी।
यह दीगर बात है कि मुख्यमंत्री कुर्सी हथियाने के चलते 2002 में बीजेपी की गुटबाजी चरम तक पहुंची और उत्तराखंड राज्य के पहले चुनाव में ही बीजेपी हार गई और नारायण दत तिवारी ने पूरे पांच साल तक कांग्रेस की सरकार चलायी।
2007 में बीजेपी को सरकार बनाने का मौका मिला लेकिन जनरल खंडूडी को बदलकर निशंक और हार के भय से निशंक को हटाकर ” खंडूडी है जरूरी ” का नारा दिया गया जो खुद खंडूडी की हार के कारण बेमानी साबित हो गया – कांग्रेस 2012 में फिर सत्ता में लौट आयी।
उत्तराखंड राज्य में सीएम की कुर्सी का जादू इस कदर हावी रहा कि कांग्रेस ने भी पांच साल में दो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और हरीश रावत देख लिये। उत्तराखंड राज्य में हरीश रावत एक मात्र ऐसे कांग्रेसी नेता हैं – जिन के भगीरथ प्रयास से कांग्रेस दो बार सत्ता में आयी लेकिन सीएम की कुर्सी पर जुगाड़ दूसरे का बैठ गया।
विजय बहुगुणा को कांग्रेस आलाकमान ने जून 2013 की आपदा में शिथिल कामकाज के चलते हटाया और बीजेपी की तरह कांग्रेस ने हरीश रावत को दिल्ली से मुख्यमंत्री बनाकर भेजा।
कांग्रेस में मुख्यमंत्री की आस लगाये हरक सिंह रावत और सतपाल महाराज ने बजट सत्र के दौरान दल बदलकर कर बीजेपी की शरण ली और अपनी सरकार को बर्खास्त कराने का श्रेय लिया।
नैनीताल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने दल बदल से गिरायी गई हरीश रावत की सरकार को बहाल किया लेकिन एक दर्जन विधायकों के पाला बदलने से 2017 में कांग्रेस सत्ता में वापसी नहीं कर पायी।
57 सीटों पर प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली बीजेपी सरकार में त्रिवेंद्र सिंह रावत की लाटरी सीएम पद पर निकली लेकिन कांग्रेस मूल के पांच बागी मंत्रियों और बीजेपी के तीन पूर्व सीएम के गुटों के बीच त्रिवेंद्र सिंह रावत मात्र चार साल ही संतुलन साध पाये और गैरसेण बजट सत्र के दौरान अचानक उन्हें इस्तीफा देना पड़ा – ” बेमिसाल चार साल की सरकार ” का जश्न अधूरा रह गया।
फिर 115 दिन के मुख्यमंत्री का पद गढ़वाल सांसद तीरथ सिंह रावत को मिला। जनरल खंडूडी के चेले, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व संगठन से तालमेल रखने वाले तीरथ अफसरशाही पर नकेल कसने और प्रशासनिक क्षमता जताने में असफल साबित हुए। बिना विधायक बने और विश्वास मत हासिल किए तीरथ सिंह रावत उत्तराखंड इतिहास के पहले मुख्यमंत्री हो गए हैं ।
युवा प्रदेश और युवा नेतृत्व के नारे के साथ अब सीएम कुर्सी पर ताजपोशी पुष्कर सिंह धामी की हुई है। पहला झटका कुमायूं के बड़े चेहरे और कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य और उनके विधायक बेटे के बीजेपी पार्टी छोड़कर वापस कांग्रेस को मजबूत करने का लगा है।
हरीश रावत सत्ता में वापसी के लिए फिर सारी तिकड़में लड़ा रहे हैं। पिछली बार दो विधानसभा सीटों और लोकसभा में पराजित होने का रिकार्ड हरीश रावत के नाम पर है। बीजेपी से दल बदल कराने में इस बार मुख्यमंत्री पद की भेंट भी चढ़ानी पड़ सकती है।
मुख्यमंत्री धामी के लिए असली चुनौती बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री और कुमायूं के दिग्गज नेता बने हुए हैं – वैसे गुरू भगत सिंह कोशियाारी का वरद हस्त और केंद्र का समर्थन पाकर धामी क्या 2022 में फिर बीजेपी सत्ता में वापसी करा पायेंगे या एक बार फिर सीएम की कुर्सी सारे समीकरण पलटने वाली है – यह कश्मकश जारी है ।
पदचिह्न टाइम्स ।