
प्रेस क्लब चुनाव : हार का ठीकरा रणनीतिकार के सिर फूटा !
अध्यक्ष पद पर क्लब के 44 फीसदी सदस्यों ने यूनियन के सबल प्रत्याशी को नकार कर विजयश्री दिला दी ।
उत्तरांचल प्रेस क्लब का सालाना उत्सव संपन्न हो गया। स्वाभाविक रूप से कोई जीता, कोई हारा। चुनाव में ये तो
होना ही था – यह महत्वपूर्ण नहीं है ! महत्वपूर्ण यह है कि इस चुनाव ने एक विमर्श तैयार किया है।

विजेता की ओर से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन पराजित पक्ष ने अपनी हार का ठीकरा अपने चुनावी रणनीतिकार के नदारद रहने की कमी पर फोड़ दिया है।
सवाल पूछा जा सकता है कि जब रणनीतिकार के भरोसे ही चुनाव लड़ा जाता रहा है तो क्या आप
बीते पांच साल से कठपुतली की तरह नाचते रहे और सदस्यों को लोकतंत्र के नाम पर तमाशा दिखा रहे थे?
यानी पिछले पांच साल से एक तरह का कोलेजियम सिस्टम चल रहा था और इस मिथक को क्लब सदस्यों ने तोड़ दिया।
एक और प्रतिक्रिया सोशल मीडिया में यह तैर रही है कि क्लब चुनाव में उत्तराखंड पत्रकार यूनियन ने
17 में से 16 पदों पर जीत दर्ज की है।
यह बात समझ से परे है कि चुनाव यूनियन का था या क्लब का ?
बेहतर होता क्लब को क्लब की तरह ही चलाया जाता, उसके नियंत्रण के लिए कोलेजियम जैसी
अदृश्य सत्ता का वजूद नहीं होना चाहिए।
इस बात से कितने लोग सहमत होंगे, कहना मुश्किल है लेकिन जिस पटरी पर क्लब को ले जाने की
प्रवृत्ति पिछले कुछ वर्षों से चली आ रही थी, उस पर अल्प विराम तो लगा है।
लाख टके का सवाल यह है कि उत्तराखंड पत्रकार यूनियन का सर्वेसर्वा किस उम्मीद में एक शहर के प्रेस क्लब का चुनाव लडने का इच्छुक होता है।
हालांकि नैतिकता की बात अब पराई हो चुकी है लेकिन इस चुनाव में पराजय के बाद प्रदेश प्रमुख को
अपने पद को तिलांजलि नहीं दे देनी चाहिए?
जो व्यक्ति किसी संगठन का प्रदेश का प्रमुख हो और वह किसी शहर के संगठन का चुनाव हार जाए
तो उसकी आत्मा (अगर हो तो) क्या उसे मुखिया बने रहने पर धिक्कारती तो नहीं होगी?
अध्यक्ष पद पर क्लब के 44 फीसदी सदस्यों ने यूनियन के सबल प्रत्याशी को नकार कर विजयश्री दिलायी है।
महामंत्री और संयुक्त सचिव पद पर प्रत्याशियों को 64 फीसदी तक वोट मिले हैं।
सीधा अर्थ है कि क्लब में यूनियनबाजी के इतर भी सोच रही है।
वैसे उत्तरांचल प्रेस क्लब का चुनाव इतना बड़ा नहीं है कि प्रदेश मुखिया किसी रणनीतिकार के
भरोसे चुनाव मैदान में उतरे और आखिरी वक्त में रणनीतिकार नदारद हो जाए तो नतीजा पराजय के रूप में सामने हो।
सीधा सा अर्थ है – रणनीतिकार के भरोसे ही अब तक की उपलब्धियां दर्ज हुई हैं और साल दर साल
सिर्फ कठपुतलियां बदलती रही हैं।
जरूरत रणनीतिकार को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने की है कि उनके पास ऐसा कौन सा जादू है जो
अदृश्य रूप से भाग्य विधाता बनने की क्षमता रखे हुए हैं और पहली बार उन्होंने अपनी हैसियत का
अहसास स्टेट यूनियन को भी करा दिया है।
यानी रणनीतिकार के बिना जल बिन मछली बनी
यूनियन आगे कैसे पत्रकार हित में काम कर पाएगी, यह सवाल भी जवाब तो मांगता ही है !
— दिनेश शास्त्री ।